UP News: छोटे अपराधों में भी एनकाउंटर? अपराधियों के पैर में गोली मारने पर नाराज हुआ कोर्ट, सरकार और डीजीपी को तलब

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस मुठभेड़ों में आरोपियों के पैरों में गोली मारने की बढ़ती घटनाओं पर सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताते हुए राज्य सरकार और पुलिस को कड़े निर्देश दिए हैं।

Post Published By: Mayank Tawer
Updated : 31 January 2026, 6:55 AM IST
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Lucknow: उत्तर प्रदेश में पुलिस मुठभेड़ों का तरीका अब खुद कानून के कटघरे में खड़ा नजर आ रहा है। अपराध नियंत्रण के नाम पर अभियुक्तों के पैरों में गोली मारने की बढ़ती घटनाओं ने न्याय व्यवस्था को झकझोर दिया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि किसी भी आरोपी को सजा देने का अधिकार सिर्फ अदालत का है, पुलिस का नहीं। कानून से ऊपर जाकर की गई ऐसी कार्रवाई न केवल संविधान के खिलाफ है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की जड़ों को भी कमजोर करती है।

हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी

यह अहम टिप्पणी जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने राजू उर्फ राजकुमार की जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान की। कोर्ट ने माना कि पुलिस द्वारा मुठभेड़ के नाम पर पैरों में गोली मारना कानून के शासन और संवैधानिक मर्यादाओं के विपरीत है। अदालत ने राज्य सरकार और पुलिस अधिकारियों को सख्त दिशा-निर्देश जारी करते हुए चेतावनी दी कि इनके उल्लंघन पर अवमानना की कार्यवाही की जाएगी।

मुठभेड़ की प्रक्रिया पर सवाल

सुनवाई के दौरान याची के अधिवक्ता कुसुम मिश्रा ने दलील दी कि राजू को झूठे मामले में फंसाया गया है और कथित मुठभेड़ में सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया गया। कोर्ट ने इसे गंभीर मानते हुए अपर मुख्य सचिव (गृह) संजय प्रसाद और पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) राजीव कृष्णा को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से तलब किया।

सरकार और डीजीपी का जवाब

शुक्रवार को दोनों वरिष्ठ अधिकारी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये कोर्ट में पेश हुए और आश्वासन दिया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने के लिए सर्कुलर जारी कर दिए गए हैं। उन्होंने कहा कि नियमों की अनदेखी करने वाले पुलिसकर्मियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।

कानून से ऊपर नहीं पुलिस

हाईकोर्ट ने दो टूक कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और इसे संविधान के अनुसार ही चलाया जाना चाहिए, जहां विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की सीमाएं स्पष्ट हैं। पुलिस अधिकारियों को किसी भी आरोपी के हाथ या पैर जैसे अंगों पर गैरजरूरी तरीके से गोली मारने की अनुमति कानून नहीं देता।

पुलिस को चोट नहीं, संदेह गहराया

पीठ ने यह भी कहा कि हाल के दिनों में चोरी और लूट जैसे छोटे अपराधों में भी मुठभेड़ दिखाकर आरोपियों को गोली मारी जा रही है। मौजूदा मामले में किसी भी पुलिसकर्मी को चोट नहीं आई, जिससे पूरे घटनाक्रम पर संदेह पैदा होता है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश दोहराए

हाईकोर्ट ने पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि मुठभेड़ में मौत या गंभीर चोट की स्थिति में तुरंत एफआईआर दर्ज होनी चाहिए। जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए। घायल का बयान मजिस्ट्रेट या मेडिकल अधिकारी के सामने दर्ज किया जाए। मुठभेड़ के बाद पुलिसकर्मियों को इनाम या पदोन्नति न दी जाए। नियम तोड़ने पर एनकाउंटर टीम के साथ जिले के एसपी, एसएसपी या कमिश्नर भी अवमानना के जिम्मेदार होंगे।

Location : 
  • Lucknow

Published : 
  • 31 January 2026, 6:55 AM IST

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