राम मंदिर दान पर रार: सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर पहुंचा वित्तीय गड़बड़ी का मामला, 20 जुलाई को बड़ा फैसला संभव

अयोध्या से जुड़ा एक ऐसा विवाद अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है, जिसने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई में कुछ अहम दस्तावेज, जवाब और रिपोर्ट सामने आ सकती हैं। आखिर ऐसा क्या है, जिसे लेकर हर किसी की नजर अदालत पर टिकी है?

Updated : 19 July 2026, 10:37 AM IST
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New Delhi: अयोध्या के भव्य राम मंदिर में चढ़ावे और पैसों के लेन-देन में कथित वित्तीय गड़बड़ी का मामला अब देश की सबसे बड़ी अदालत की चौखट पर पहुंच चुका है। सुप्रीम कोर्ट आगामी 20 जुलाई को इस मामले से जुड़ी कई गंभीर याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करने के लिए तैयार है। इन याचिकाओं में मांग की गई है कि चढ़ावे में हुई हेराफेरी के आरोपों की एक तय समय-सीमा के भीतर और पूरी तरह निष्पक्ष जांच कराई जाए।

अदालत की कार्यसूची के अनुसार, इस संवेदनशील मामले पर तीन जजों की पीठ सुनवाई करेगी, जिसमें प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल हैं।

SIT और राम मंदिर ट्रस्ट पर टिकी अदालत की नजर

इससे पहले, 13 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं को स्वीकार करते हुए सख्त रुख अपनाया था। शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा इस मामले की जांच के लिए गठित की गई विशेष जांच टीम (SIT) को आदेश दिया है कि वह सुनवाई के दौरान अपनी 'स्टेटस रिपोर्ट' (अब तक की जांच का ब्योरा) अदालत के सामने पेश करे। इसके अलावा, अदालत ने 'श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट' को भी आधिकारिक नोटिस भेजकर इस पूरे विवाद पर उनका जवाब दाखिल करने को कहा है।

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'निर्मोही अखाड़ा' की बड़ी मांग

राम जन्मभूमि विवाद में शुरू से ही मुख्य पक्षकार रहे 'निर्मोही अखाड़ा' ने इस मामले में केंद्र सरकार की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। अखाड़े ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई है कि वह केंद्र सरकार को 'श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट' के पुनर्गठन का निर्देश दे। अखाड़े का आरोप है कि वर्तमान में यह ट्रस्ट एक 'निजी संस्था' (प्राइवेट ट्रस्ट) की तरह काम कर रहा है, जो नवंबर 2019 में आए सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले की भावना के खिलाफ है। अखाड़े की मांग है कि इसे पूरी तरह से एक 'पब्लिक ट्रस्ट' का रूप दिया जाए।

पैसों का हो फॉरेंसिक ऑडिट, गर्भगृह में लौटें 'मूल रामलला'

निर्मोही अखाड़े ने अपनी याचिका में कई कड़े कदम उठाने की मांग की है, जिसने इस कानूनी लड़ाई को और दिलचस्प बना दिया है-

फॉरेंसिक ऑडिट: ट्रस्ट द्वारा अब तक किए गए पैसों, दान और संपत्तियों के तमाम लेन-देन की बारीकी से जांच करने के लिए एक स्वतंत्र 'फॉरेंसिक ऑडिटर' की नियुक्ति की जाए।

पुरानी मूर्तियों की वापसी: याचिका में कहा गया है कि 5 जनवरी 1950 और 16 फरवरी 1982 को कुर्क की गईं रामलला की मूल (पुरानी) मूर्तियों को ही वापस मुख्य गर्भगृह में स्थापित किया जाना चाहिए। अखाड़े के मुताबिक, ट्रस्ट के पास इन प्राचीन मूर्तियों को हटाने या बदलने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था।

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रामानंदी परंपरा से हो पूजा, संतों के हाथ में हो कमान

वित्तीय मामलों के साथ-साथ मंदिर की धार्मिक व्यवस्था को लेकर भी सवाल खड़े किए गए हैं। निर्मोही अखाड़े का तर्क है कि राम मंदिर के अंदर होने वाले सभी रीति-रिवाज, भोग, सेवा और पूजा पद्धतियां केवल 'रामानंदी संप्रदाय' की प्राचीन परंपराओं और अखाड़े के पुराने नियमों के अनुसार ही होनी चाहिए।

ट्रस्ट की मनमानी रोकने और उस पर संतों की निगरानी बनाए रखने के लिए कोर्ट से दिशा-निर्देश (गाइडलाइंस) तय करने की मांग की गई है। साथ ही, एक स्वतंत्र कमेटी बनाने की वकालत की गई है जो यह देख सके कि साल 2019 में आए सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अक्षरशः पालन हो रहा है या नहीं। अब हर किसी की निगाहें 20 जुलाई को होने वाली इस बड़ी अदालती कार्रवाई पर टिकी हैं।

Location :  New Delhi

Published :  19 July 2026, 10:37 AM IST

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