शादी के मंडप से सड़क तक: दहेज प्रताड़ना का ऐसा दर्द जानकर आप भी होंगे हैरान

यह एक परिवार का झगड़ा नहीं है, उस बीमार सोच का आइना है, जिसमें बेटी को बोझ और दहेज को शर्त मान लिया गया। कानून की किताबें धूल खा रही हैं और बेटियां दर-दर भटक रही हैं।

Post Published By: Jay Chauhan
Updated : 8 June 2026, 11:39 AM IST
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Muzaffarnagar: शादी के फेरों में लिए वादे झूठे निकले और ससुराल का आंगन दहेज की आग में जल गया। रविवार को रुड़की रोड के एक रेस्टोरेंट में पत्रकारवार्ता के मंच पर जब देहरादून की ओमसीटी निवासी अंशिका मित्तल पुत्री संदीप मित्तल ने होंठ खोले तो शब्द नहीं, एक बेटी का टूटा हुआ सपना निकला। आंखों में आंसू नहीं थे, क्योंकि आंसू तो प्रशासन की चौखटों पर बह चुके थे। अब बची थी सिर्फ चीख - इंसाफ की चीख।

भाकियू भानू के जिलाध्यक्ष विशाल मित्तल ने मंच से हुंकार भर दी कि अब यह मामला कोर्ट-कचहरी तक ही नहीं रुकेगा, सड़क पर उतरकर लड़ा जाएगा।

22 जनवरी 2022 को लक्ष्मण विहार निवासी अधिवक्ता अर्चित अग्रवाल के साथ अंशिका के हाथ पीले हुए थे। मायके से विदाई के समय मां ने कहा था "बेटा ससुराल ही तेरा घर है"। लेकिन अंशिका को क्या पता था कि यही घर उसके लिए जेल बन जाएगा। पत्रकारवार्ता में उसने बताया कि शादी के कुछ महीने बाद ही दहेज की मांग ने रिश्ते को निगलना शुरू कर दिया। पहले इशारों में, फिर सीधे शब्दों में अतिरिक्त धनराशि मांगी गई। जब मायके वाले मांग पूरी न कर सके तो सम्मान की जगह गाली मिली, प्यार की जगह मारपीट मिली। वह सम्मान और सुरक्षा जो हर बेटी ससुराल से मांगती है, अंशिका के हिस्से में सिर्फ जख्म आए।

शपथपत्र का हथियार, पत्नी को बेघर, बेटे को संरक्षण

अंशिका ने 26 जनवरी 2025 की वह तारीख याद की जब उसके सास-ससुर ने अखबार में शपथपत्र छपवाकर उसे और उसके पति को घर से बेदखल करने की घोषणा कर दी। लेकिन तमाशा देखिए, शपथपत्र के बाद भी अर्चित अग्रवाल आज भी माता-पिता के आंगन में राज कर रहा है। संरक्षण भी है, सुरक्षा भी है। सवाल अंशिका का सीधा है - अगर बेटे को घर में रहने का हक है तो बहू को सड़क पर क्यों धकेल दिया गया। भावुक होते हुए उसने कहा "मैं भीख नहीं मांग रही साहब, मैं अपना हक मांग रही हूं। कानून ने मुझे पत्नी का दर्जा दिया है, तो फिर मुझे मेरे घर से बेदखल क्यों किया जा रहा है"।

भाकियू भानू के पदाधिकारियों ने पत्रकारवार्ता में व्यवस्था और समाज दोनों को कठघरे में खड़ा कर दिया। कहा कि यह एक परिवार का झगड़ा नहीं है। यह उस बीमार सोच का आइना है जिसमें बेटी को बोझ और दहेज को शर्त मान लिया गया। कानून की किताबें धूल खा रही हैं और बेटियां दर-दर भटक रही हैं। विशाल मित्तल ने साफ शब्दों में कहा कि अब सहनशीलता खत्म हो चुकी है। अगर बेटी को उसका हक नहीं मिला तो भाकियू भानू चूड़ी नहीं पहनेगा, ईंट से ईंट बजा देगा।

अंतिम चेतावनी - सात दिन या फिर धरना

पत्रकारवार्ता में अंशिका ने जिला प्रशासन और पुलिस से आखिरी बार गुहार लगाई कि मामले की निष्पक्ष जांच हो और उसे उसके वैवाहिक घर में संरक्षण दिया जाए। साथ ही सात दिन का अल्टीमेटम भी दे दिया। कहा कि अगर एक हफ्ते में ससुराल का दरवाजा नहीं खुला तो वह भाकियू भानू के बैनर तले अपने ससुराल के बाहर धरने पर बैठ जाएगी। और अगर फिर भी सुनवाई नहीं हुई तो लखनऊ जाकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आवास के बाहर दरना डाल देगी। "मुझे न्याय चाहिए, एहसान नहीं" - यही आखिरी शब्द कहकर अंशिका मंच से उठ गई।

पत्रकारवार्ता में अंशिका मित्तल के साथ सार्थक मित्तल, ममता मित्तल और भाकियू भानू से विशाल मित्तल दर्जनों कार्यकर्ताओं के साथ मौजूद रहे। अब गेंद प्रशासन के पाले में है। देखना यह है कि वह बेटी की चीख सुनता है या फाइलों के बोझ तले उसे फिर कुचल देता है।

Location :  Muzaffarnagar

Published :  8 June 2026, 11:38 AM IST

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