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रील के दौर में भी कायम है 1989 का जादू (Img- Pinterest)
Patna: बिहार और पूर्वांचल के किसी भी शादी वाले घर में चले जाइए, ढोलक की पहली थाप के साथ जो गाना सबसे पहले गूंजता है, वह कोई नया डीजे रीमिक्स नहीं बल्कि 35 साल पुराना एक पारंपरिक विवाह गीत है। बिहार की स्वर कोकिला स्वर्गीय शारदा सिन्हा द्वारा 1989 में गाया गया गीत 'सांवर सांवर सुरतिया तोहार दुल्हा' आज तीन दशकों बाद भी हर मंडप और आंगन की पहचान बना हुआ है। कमाल की बात यह है कि आज के डिजिटल और रील्स के दौर में भी यह गाना सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला बैकग्राउंड ट्रैक बना हुआ है।
इस लोकगीत की सबसे बड़ी खूबसूरती इसका सांस्कृतिक और भक्तिमय भाव है। यह गीत मुख्य रूप से भगवान श्रीराम और माता सीता के शुभ विवाह के प्रसंग को ध्यान में रखकर रचा गया है। इसमें होने वाले दूल्हे की सांवली और मनमोहक छवि का वर्णन इतने सहज और मिठास भरे शब्दों में किया गया है कि सुनते ही पूरा परिवार भक्ति और उत्सव के माहौल में सराबोर हो जाता है। यही वजह है कि जब भी बारात द्वार पर आती है, यह गाना हर दिल को छू लेता है।
पद्म भूषण से सम्मानित स्वर्गीय शारदा सिन्हा की आवाज भोजपुरी और मैथिली लोक संगीत की आत्मा मानी जाती है। उन्होंने न सिर्फ 'काहे तोसे सजना' (मैंने प्यार किया), 'बाबुल' (हम आपके हैं कौन) और 'तार बिजली' (गैंग्स ऑफ वासेपुर) जैसे सुपरहिट बॉलीवुड गानों से सिनेमा जगत में अपनी अमिट छाप छोड़ी, बल्कि पूर्वांचल के छठ पर्व और शादी-विवाह के सोहर-गाली गानों को विश्व पटल पर पहचान दिलाई।
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5 नवंबर 2024 को शारदा सिन्हा के निधन से लोक संगीत के एक सुनहरे युग का अंत जरूर हो गया, लेकिन उनके गाए ऐसे सदाबहार गीत आज भी उन्हें हर शादी, त्योहार और मांगलिक कार्य में जीवित रखते हैं। 'सांवर सांवर सुरतिया' केवल एक गाना नहीं, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक धरोहर बन चुका है, जो पीढ़ियों से शादियों की नींव बना हुआ है।
Location : Patna
Published : 24 July 2026, 3:52 PM IST