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लोकसभा सीट बढ़ाने की तैयारी तेज (फोटो सोर्स- इंटरनेट)
New Delhi: केंद्र की मोदी सरकार एक बार फिर लोकसभा सीटों के परिसीमन और महिला आरक्षण को लागू करने के लिए संविधान संशोधन बिल संसद में पेश करने की तैयारी कर रही है। पिछली बार बहुमत के अभाव में यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका था, लेकिन इस बार सरकार विपक्ष के कुछ प्रमुख दलों को साथ लेने की रणनीति पर काम कर रही है।
सूत्रों के अनुसार, सरकार इस बार अपने संविधान संशोधन बिल में यह स्पष्ट रूप से शामिल करना चाहती है कि जब लोकसभा की कुल सीटें बढ़ाकर 850 की जाएंगी, तब सभी राज्यों को मिलने वाली सीटों का अनुपात लगभग समान ही रहेगा। पिछली बार यह आश्वासन केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित था, जिसे विपक्ष ने स्वीकार नहीं किया था।
सरकार की कोशिश है कि सीटों के पुनर्वितरण को लेकर किसी भी तरह की असमानता की आशंका को दूर किया जाए, ताकि दक्षिणी राज्यों का भरोसा जीता जा सके।
सरकार का प्रस्ताव है कि लोकसभा की अधिकतम सीट संख्या 550 से बढ़ाकर 850 की जाए। इसके साथ ही सीटों के बंटवारे के लिए 1971 की जनगणना को आधार बनाए रखने की बात भी सामने आ रही है।
इसके अलावा एक अलग डीलिमिटेशन बिल भी लाने की योजना है, जिसके बाद परिसीमन आयोग का गठन किया जाएगा। यह आयोग तय करेगा कि नई लोकसभा और विधानसभा सीटों की सीमाएं किस तरह निर्धारित होंगी।
वर्तमान व्यवस्था में विधानसभा सीटों के पुनर्गठन के लिए 2001 की जनगणना का उपयोग होता है, जिसे बदलकर 2011 की जनगणना को आधार बनाने पर भी विचार किया जा रहा है।
संविधान का अनुच्छेद 81(3) स्पष्ट करता है कि लोकसभा सीटों का बंटवारा पिछली जनगणना के आधार पर किया जाएगा। इसका अर्थ यह भी निकाला जा रहा है कि 2027 की जनगणना के बाद परिसीमन की प्रक्रिया स्वतः शुरू हो सकती है।
सरकार का तर्क है कि यदि संविधान संशोधन नहीं होता, तो जनसंख्या के आधार पर उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों में सीटों का असंतुलन और अधिक स्पष्ट हो जाएगा।
इस बार सरकार की रणनीति में दो प्रमुख विपक्षी दलों- Dravida Munnetra Kazhagam (DMK) और All India Trinamool Congress (TMC) की भूमिका अहम मानी जा रही है।
हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों और आंतरिक असंतोष की चर्चाओं के बीच सरकार इन दलों से समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है। हालांकि, दोनों ही दल इस मुद्दे पर स्पष्ट कानूनी गारंटी की मांग कर रहे हैं।
DMK सांसद कनिमोझी करुणानिधि ने पहले ही परिसीमन आयोग की स्वतंत्रता और सरकार के आश्वासनों को लेकर सवाल उठाए थे।
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दक्षिण भारत के कई राज्य इस प्रस्ताव से पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं। उनकी मुख्य चिंता यह है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों के पुनर्वितरण से उत्तर और दक्षिण के बीच राजनीतिक असंतुलन और बढ़ सकता है।
विपक्ष का तर्क है कि सरकार द्वारा दिए गए आश्वासन अगर कानून में स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं किए गए, तो भविष्य में उन्हें बदला भी जा सकता है। इसलिए वे लिखित कानूनी प्रावधान की मांग कर रहे हैं।
फिलहाल केंद्र सरकार के पास दो प्रमुख विकल्प बताए जा रहे हैं। पहला, मानसून सत्र में पुराना संविधान संशोधन बिल फिर से पेश किया जाए। दूसरा, बिल में आवश्यक बदलाव कर उसे कैबिनेट से मंजूरी दिलाई जाए और फिर संशोधित रूप में संसद में लाया जाए।
Location : New Delhi
Published : 9 June 2026, 10:44 AM IST