‘पढ़ाई पर ध्यान दो, कपड़ों पर नहीं’, सेंट स्टीफंस का नया फरमान बना Gen-Z के लिए सिरदर्द, आखिर क्यों भड़क उठे छात्र?

डीयू के सेंट स्टीफंस कॉलेज में नया सेशन शुरू होते ही शॉर्ट्स पहनने पर लगे बैन ने तहलका मचा दिया है। क्लासरूम से लेकर डाइनिंग हॉल तक पाबंदी और 'मोरल पुलिसिंग' के आरोपों के बीच आखिर क्यों भड़की है Gen-Z? जानिए इस अंदरूनी और गरमाती हुई बड़ी खबर की पूरी सच्चाई।

Updated : 30 July 2026, 10:55 AM IST
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New Delhi: फैशन और आजादी के नए दौर में सांस लेने वाली Gen-Z पीढ़ी के लिए क्या कपड़े पहनने की आजादी भी अब एक जंग बनती जा रही है? दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफंस कॉलेज में नया अकादमिक सत्र शुरू होते ही एक ऐसा विवाद खड़ा हो गया है, जिसने परिसरों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अनुशासन के बीच की बहस को फिर से हवा दे दी है। कॉलेज प्रशासन द्वारा कैंपस के कई प्रमुख हिस्सों में शॉर्ट्स पहनने पर लगाए गए बैन ने छात्रों और छात्र संगठनों को सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक मुखर होने के लिए मजबूर कर दिया है।

क्लासरूम से लेकर डाइनिंग हॉल तक पाबंदी

विवाद की शुरुआत कॉलेज की प्रिंसिपल प्रो सुजन एलियास द्वारा जारी किए गए नए दिशा-निर्देशों के बाद हुई। नए नियमों के मुताबिक, कॉलेज परिसर के कई अहम और साझा स्थानों पर छात्रों के शॉर्ट्स पहनकर आने पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। पाबंदियों की इस सूची में क्लासरूम, ट्यूटोरियल रूम, लैब, असेंबली हॉल, लाइब्रेरी और यहां तक कि डाइनिंग हॉल को भी शामिल किया गया है। प्रशासन का यह फरमान सामने आते ही छात्रों के बीच सुगबुगाहट शुरू हो गई, जो देखते ही देखते विरोध के स्वर में बदल गई।

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अनुशासन के नाम पर अन्य कड़े नियम भी लागू

ड्रेस कोड के अलावा कॉलेज प्रशासन ने कैंपस में कुछ और सख्त निर्देश भी लागू किए हैं। पूरे परिसर को पूरी तरह से 'स्मोक-फ्री' घोषित कर दिया गया है और चेतावनी दी गई है कि नियम तोड़ने वालों पर कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। इसके अलावा, परिसर में साफ-सफाई बनाए रखने के लिए केवल कूड़ेदान में ही कचरा डालने और सभी विद्यार्थियों के लिए हर समय अपना कॉलेज आईडी कार्ड साथ रखना अनिवार्य कर दिया गया है। हालांकि, अन्य नियम जहां प्रशासनिक व्यवस्था और स्वच्छता से जुड़े हैं, वहीं ड्रेस कोड का मुद्दा सबसे बड़ा केंद्र बन गया है।

'यह मोरल पुलिसिंग है, कपड़ों से नहीं पढ़ाई से मतलब होना चाहिए'

छात्रों का साफ तौर पर कहना है कि यह नियम सीधे तौर पर उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता में दखलंदाजी और 'मोरल पुलिसिंग' (नैतिक पहरेदारी) है। कॉलेज की एक सेकंड ईयर की छात्रा ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए दो टूक कहा कि प्रशासन को अपनी ऊर्जा और ध्यान शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने पर लगाना चाहिए, न कि छात्रों के पहनावे पर नजर रखने और नैतिक पाठ पढ़ाने पर। छात्रों का तर्क है कि आधुनिक शैक्षणिक संस्थानों में इस तरह के प्रतिबंध उनकी अभिव्यक्ति और सहजता को प्रभावित करते हैं।

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राजनीतिक गलियारों तक पहुंचा मामला, NSUI ने बोला हमला

यह विवाद अब केवल कॉलेज की चार दीवारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि छात्र संगठनों ने भी इसमें कूदकर इसे राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बना दिया है। नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद जाखड़ ने इस फैसले की कड़ी निंदा की है। उन्होंने कहा कि देश का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद के कपड़े पहनने, खान-पान और अभिव्यक्ति की पूरी आजादी देता है। आज की Gen-Z पीढ़ी संविधान के इन्हीं मूल मूल्यों में अटूट विश्वास रखती है और प्रशासन की इस तरह की दमनकारी और 'मोरल पुलिसिंग' की कोशिशों को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

एक तरफ जहां कॉलेज प्रशासन अपनी व्यवस्था और अनुशासन के तर्क पर अडिग है, वहीं दूसरी तरफ छात्रों का यह आक्रोश संकेत दे रहा है कि आने वाले दिनों में यह विवाद और अधिक तूल पकड़ सकता है।

Location :  New Delhi

Published :  30 July 2026, 10:55 AM IST

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