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दिल्ली हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
New Delhi : पति-पत्नी के बीच तलाक से जुड़े एक मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ किया है कि अगर दोनों पक्ष एक-दूसरे पर क्रूरता के आरोप लगा रहे हों, तो ऐसे विवाद को आपसी सहमति से तलाक का मामला नहीं माना जा सकता। अदालत ने परिवार न्यायालय के उस फैसले को निरस्त कर दिया, जिसमें विवादित याचिका को म्यूचुअल कंसेंट तलाक में बदलकर विवाह समाप्त कर दिया गया था।
न्यायमूर्ति विवेक चौधरी और न्यायमूर्ति रेणु भटनागर की खंडपीठ ने पत्नी की अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत लगाए गए क्रूरता संबंधी आरोप अपने आप धारा 13बी के तहत आपसी सहमति का आधार नहीं बनते। अदालत ने माना कि केवल शादी खत्म करने की इच्छा जताना ही आपसी सहमति नहीं कहलाता।
पीठ ने अपने फैसले में कहा कि यदि एक पक्ष क्रूरता के आधार पर तलाक मांग रहा है और दूसरा पक्ष उन आरोपों का विरोध करते हुए स्वयं भी आरोप लगा रहा है, तो दोनों के दावे विरोधी प्रकृति के बने रहते हैं। ऐसे मामलों को सहमति आधारित तलाक नहीं माना जा सकता।
मामले के अनुसार, दंपती की शादी जनवरी 2023 में हुआ था। शादी के बाद दोनों के बीच लड़ाई-झगड़े बढ़ते गए और जनवरी 2024 से वे अलग-अलग रहने लगे। इस दौरान उनकी कोई संतान भी नहीं हुई। बाद में पति ने फैमिली कोर्ट में याचिका दाखिल कर पत्नी पर क्रूरता का आरोप लगाते हुए तलाक की मांग की। जवाब में पत्नी ने भी पति पर मानसिक और वैवाहिक प्रताड़ना के आरोप लगाए और अपना प्रतिदावा पेश किया।
मार्च 2025 में फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों के बयान दर्ज करने के बाद मामले को आपसी सहमति से तलाक में परिवर्तित कर दिया और विवाह समाप्त करने का आदेश दे दिया। हालांकि पत्नी ने इस फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट ने पत्नी की दलीलों को स्वीकार करते हुए परिवार अदालत का आदेश रद्द कर दिया। इस फैसले को वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने साफ संदेश दिया है कि आपसी आरोप-प्रत्यारोप और विवादित दावों वाले मामलों को केवल तलाक की इच्छा के आधार पर म्यूचुअल कंसेंट नहीं माना जा सकता।
Location : New Delhi
Published : 10 June 2026, 4:11 PM IST