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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए साफ कहा है कि माता-पिता और भाई-बहनों की जिम्मेदारी का हवाला देकर पति पत्नी के भरण-पोषण के दायित्व से बच नहीं सकता। अदालत ने कहा कि पत्नी का भरण-पोषण पति की प्राथमिक कानूनी जिम्मेदारी है और इससे बचने के लिए पारिवारिक दायित्वों का बहाना नहीं बनाया जा सकता।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ( Img: Google)
Prayagraj: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए साफ कहा है कि माता-पिता और भाई-बहनों की जिम्मेदारी का हवाला देकर पति पत्नी के भरण-पोषण के दायित्व से बच नहीं सकता। अदालत ने कहा कि पत्नी का भरण-पोषण पति की प्राथमिक कानूनी जिम्मेदारी है और इससे बचने के लिए पारिवारिक दायित्वों का बहाना नहीं बनाया जा सकता।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की पीठ ने उस समय की, जब इटावा के एक रेलवे कर्मचारी द्वारा दाखिल आपराधिक पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई की जा रही थी। अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया।
मामला तब सामने आया, जब इटावा निवासी याची की पत्नी ने पारिवारिक न्यायालय में भरण-पोषण बढ़ाने के लिए आवेदन दाखिल किया था। सुनवाई के बाद अदालत ने पत्नी के लिए तय भरण-पोषण भत्ता 3500 रुपये से बढ़ाकर 8000 रुपये प्रति माह कर दिया। वहीं, नाबालिग बेटे के लिए यह राशि 1500 रुपये से बढ़ाकर 4000 रुपये प्रतिमाह कर दी गई।
इस आदेश को चुनौती देते हुए पति ने हाईकोर्ट में आपराधिक पुनर्विचार याचिका दाखिल की। याचिका में उसने कहा कि वह रेलवे में ग्रुप-डी कर्मचारी है और करीब 55 हजार रुपये मासिक वेतन पाता है। उसके अनुसार, इस आय से उसे अपने दैनिक खर्चों के साथ वृद्ध माता-पिता और अविवाहित भाई-बहनों का भी खर्च उठाना पड़ता है, जिससे उस पर आर्थिक दबाव है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पति की इन दलीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि 55 हजार रुपये मासिक आय इतनी कम नहीं है कि पति अपनी पत्नी और बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी निभाने में असमर्थ हो। अदालत ने यह भी कहा कि भरण-पोषण का प्रावधान इसलिए बनाया गया है, जिससे पत्नी पति की आय के अनुरूप सम्मानजनक जीवन जी सके। केवल अन्य पारिवारिक जिम्मेदारियों का हवाला देकर पति अपने वैधानिक कर्तव्य से पीछे नहीं हट सकता।
सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए याची की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्नी और बच्चे के लिए तय की गई बढ़ी हुई भरण-पोषण राशि उचित है और इसे बरकरार रखा जाएगा।