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भारत-यूरोपीय संघ के बीच हुए FTA का असर सिर्फ लग्जरी कारों तक सीमित नहीं रहेगा। खाने-पीने की चीजों से लेकर कपड़ा और रत्न-आभूषण तक, यह समझौता महंगाई घटाने, रोजगार बढ़ाने और भारत को ग्लोबल मार्केट में मजबूत बनाने वाला है।
इंडिया-EU ट्रेड डील से खुलेगा रोजगार (फोटो सोर्स- डाइनामाइट न्यूज़)
New Delhi: भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुआ मुक्त व्यापार समझौता (FTA) सिर्फ कूटनीतिक जीत नहीं, बल्कि सीधे-सीधे आम नागरिक की जेब, उद्योगों की ग्रोथ और भारत की वैश्विक पहचान से जुड़ा बड़ा आर्थिक फैसला है। एक हफ्ते पहले सामने आई इस डील की खबर अब धीरे-धीरे अपना असली असर दिखाने लगी है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि कौन-सी चीजें सस्ती होंगी, बल्कि यह है कि यह डील भारत की अर्थव्यवस्था की दिशा कैसे बदलेगी?
अब तक FTA को लग्जरी कार और शराब से जोड़कर देखा जा रहा था, लेकिन इसका सबसे बड़ा फायदा रोजमर्रा की खाने-पीने की चीजों पर पड़ेगा।
यूरोपीय यूनियन से आने वाले चॉकलेट, बिस्कुट, ऑलिव ऑयल, पास्ता, कीवी, नाशपाती और फलों के जूस जैसे प्रोडक्ट्स पर भारी टैक्स लगता था। अब टैरिफ हटने या कम होने से ये चीजें भारतीय बाजार में सस्ती होंगी।
इसका मतलब साफ है- आयात सस्ता होगा, बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और घरेलू कंपनियों पर कीमत घटाने का दबाव बनेगा। यानी महंगाई से जूझ रहे मिडिल क्लास को सीधी राहत।
वाइन, बीयर और स्पिरिट्स पर टैरिफ घटने को सिर्फ "अमीरों की खुशी" मानना बड़ी भूल होगी।
जब 150% टैक्स घटकर 20-30% होता है, तो उसका असर सिर्फ बार या होटल तक सीमित नहीं रहता।
सरकार को कम टैक्स के बावजूद ज्यादा वॉल्यूम से स्थिर राजस्व मिलेगा, जबकि उपभोक्ता को बेहतर क्वालिटी और सही कीमत।
BMW, Mercedes, Audi या Lamborghini का सस्ता होना सुर्खियों में है, लेकिन असली फायदा ऑटो इंडस्ट्री के इकोसिस्टम को होगा।
यूरोपीय कार कंपनियां भारत को सिर्फ मार्केट नहीं, बल्कि मैन्युफैक्चरिंग और रिसर्च हब के रूप में देखने लगेंगी।
इसका मतलब- सस्ती कार से ज्यादा अहम है सस्ती टेक्नोलॉजी और कुशल नौकरियाँ।
यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और प्रधान प्रधानमंत्री मोदी (फोटो सोर्स- इंटरनेट)
इस FTA का सबसे मजबूत स्तंभ है भारतीय निर्यात।
कपड़ा, चमड़ा और रत्न-आभूषण जैसे सेक्टर को अब यूरोप में बिना ड्यूटी के एंट्री मिलेगी। इसका सीधा असर छोटे और मझोले उद्योगों (MSME) पर पड़ेगा।
यूरोप जैसे हाई-वैल्यू मार्केट में भारतीय उत्पादों की मांग बढ़ना भारत को "सस्ता नहीं, भरोसेमंद सप्लायर" की पहचान देगा।
यह डील ऐसे समय आई है जब यूरोप चीन पर निर्भरता कम करना चाहता है। ऐसे में भारत को रणनीतिक विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
FTA के जरिए भारत ने साफ संदेश दे दिया है कि वह सिर्फ उपभोक्ता नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक भागीदार है।
इस समझौते पर हस्ताक्षर के बाद इसे पूरी तरह लागू होने में करीब एक साल लगेगा। इस दौरान नियम, स्टैंडर्ड और रेगुलेशन तय होंगे।
लेकिन इतना तय है कि यह डील आने वाले दशक की आर्थिक नींव रखेगी।
इंडिया- EU FTA को अगर सिर्फ सस्ती वाइन या लग्जरी कार के चश्मे से देखा गया, तो हम इसकी असली ताकत चूक जाएंगे। यह समझौता- महंगाई पर लगाम, रोजगार का विस्तार, निर्यात में उछाल, भारत की वैश्विक साख मजबूत करने वाला कदम है। यानी यह डील सिर्फ जेब हल्की नहीं, भारत का कद भारी करने वाली डील है।