DN Exclusive: आस्था थी, पर रास्ता नहीं था… कैसे 1925 के बाद राजनीति, भूगोल और व्यवस्था ने नंदा राजजात से कुमाऊं को कर दिया अलग?

नंदा राजजात यात्रा उत्तराखंड की साझा आस्था की पहचान रही है, लेकिन 1925 के बाद कुमाऊं की भागीदारी लगभग खत्म हो गई। चंद वंश के राजा के निधन से लेकर संसाधनों की कमी तक, कई वजहों ने इस ऐतिहासिक दूरी को जन्म दिया। इस खास स्टोरी में पढ़िए नंदा राजजात की अनसुनी कहानी…

Updated : 4 February 2026, 7:49 PM IST
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Almora: उत्तराखंड की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान की बात हो, और नंदा राजजात यात्रा का जिक्र न हो ऐसा संभव नहीं। लेकिन इस ऐतिहासिक यात्रा के भीतर एक ऐसी चुप्पी छुपी है, जिसे दशकों तक शायद ही किसी ने गंभीरता से टटोला हो। यह चुप्पी है कुमाऊं की भागीदारी के अचानक थम जाने की, जो साल 1925 के बाद लगभग 75 वर्षों तक कायम रही।

नंदा राजजात यात्रा केवल एक धार्मिक पदयात्रा नहीं, बल्कि गढ़वाल और कुमाऊं की साझा लोक स्मृति है। यह मां नंदा की विदाई की वह कथा है, जिसमें पूरा पहाड़ मायके से ससुराल तक की भावनात्मक यात्रा में शामिल होता है। ऐसे में सवाल उठता है- अगर आस्था साझा थी, तो रास्ते क्यों अलग हो गए?

चंद राजाओं की विरासत और यात्रा की राजनैतिक छाया

इतिहास के पन्ने पलटें तो नंदा राजजात यात्रा में चंद वंश की भूमिका बेहद अहम रही है। कुमाऊं क्षेत्र से इस यात्रा का नेतृत्व चंद राजाओं द्वारा किया जाता था। विशेष रूप से राजा आनंद सिंह वह कड़ी थे, जो कुमाऊं की आस्था को राजजात यात्रा से जोड़कर रखते थे।

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1925 में राजा आनंद सिंह का निधन हुआ। यह सिर्फ एक राजा की मृत्यु नहीं थी, बल्कि कुमाऊं की सामूहिक नेतृत्व परंपरा का अंत था। उनके बाद न तो कोई उत्तराधिकारी सामने आया और न ही कोई संगठित संस्था, जो कुमाऊं की ओर से यात्रा का प्रतिनिधित्व कर सके।

यहीं से नंदा राजजात की कहानी में एक खाली अध्याय जुड़ गया।

जब आस्था थी, लेकिन रास्ते नहीं थे

आज के दौर से देखें तो यह सवाल सरल लगता है कि लोग क्यों नहीं गए। लेकिन 1925 का पहाड़ समझना जरूरी है। उस समय- न सड़कें थीं, न संचार के साधन, न प्रशासनिक सहयोग। ऊपर से ब्रिटिश शासन का दौर, जहां बड़े जनसमूहों की धार्मिक यात्राओं को संदेह की नजर से देखा जाता था।

Nanda Rajjat Yatra 2026

ऐतिहासिक यात्रा की वापसी की कहानी (फोटो सोर्स- इंटरनेट)

कुमाऊं के दूरस्थ गांवों से नौटी (गढ़वाल) तक पहुंचना अपने आप में एक जोखिम भरा अभियान था। बिना नेतृत्व, बिना संसाधन और बिना सरकारी सहयोग के कुमाऊं की सहभागिता धीरे-धीरे इतिहास की परिधि से बाहर चली गई।

गढ़वाल में चलती रही यात्रा, कुमाऊं में जिंदा रही याद

दिलचस्प बात यह है कि कुमाऊं में नंदा देवी की पूजा कभी बंद नहीं हुई। अल्मोड़ा, रानीखेत, बागेश्वर- हर जगह मां नंदा बेटी के रूप में पूजी जाती रहीं। लोकगीतों, जात कथाओं और मंदिरों में नंदा राजजात की स्मृति जीवित रही, लेकिन यात्रा में भागीदारी नहीं। यह स्थिति ठीक वैसी थी जैसे कोई बेटी मायके में याद की जाती रहे, लेकिन विदाई में शामिल न हो पाए।

साल 2000: जब इतिहास ने खुद को सुधारा

करीब 75 साल बाद, वर्ष 2000 में इतिहास ने करवट ली। उत्तराखंड अलग राज्य बन चुका था और सांस्कृतिक पहचान को नए सिरे से गढ़ने का समय था। इसी दौरान तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ मुरली मनोहर जोशी के निर्देश पर कुमाऊं से एक प्रतिनिधिमंडल नंदा राजजात यात्रा में शामिल हुआ। यह केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं था, बल्कि एक टूटी हुई परंपरा को जोड़ने का प्रयास था।

अल्मोड़ा नंदा देवी मंदिर समिति के अनुसार, यह पल कुमाऊं के लिए भावनात्मक और ऐतिहासिक दोनों था।

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नंदा राजजात: आस्था से आगे की कहानी

आज नंदा राजजात यात्रा को सिर्फ धार्मिक नजरिए से देखना इसके साथ अन्याय होगा। यह यात्रा बताती है- कैसे नेतृत्व का अभाव परंपराओं को रोक सकता है, कैसे भौगोलिक कठिनाइयां सांस्कृतिक दूरी बना देती हैं और कैसे इच्छाशक्ति से इतिहास को फिर जोड़ा जा सकता है। रूपकुंड और होमकुंड की कठिन चढ़ाइयों के बीच चलती यह यात्रा दरअसल उत्तराखंड की सामूहिक चेतना की परीक्षा है।

2026 की यात्रा और भविष्य का सवाल

अब जब 2026 की नंदा राजजात यात्रा नजदीक है, सवाल फिर उठता है- क्या गढ़वाल और कुमाऊं की साझी भूमिका इस बार और मजबूत होगी? क्या इतिहास की वह चुप्पी पूरी तरह टूट पाएगी?

एक बात तय है- नंदा राजजात अब सिर्फ अतीत की परंपरा नहीं, बल्कि भविष्य की सांस्कृतिक दिशा भी तय करती है। मां नंदा की यह यात्रा आज भी पहाड़ों को जोड़ती है- आस्था से, स्मृति से और उस उम्मीद से कि साझा विरासत कभी अकेली नहीं होती।

Location : 
  • New Delhi

Published : 
  • 4 February 2026, 7:49 PM IST

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