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डोईवाला क्षेत्र में लगातार घटता गन्ना रकबा शुगर मिल के लिए बड़ा संकट बनता जा रहा है। बढ़ती लागत, कम मूल्य और भुगतान में देरी से किसान गन्ना खेती छोड़ रहे हैं, जिससे मिल संचालन और रोजगार पर असर पड़ रहा है।
डोईवाला शुगर मिल के लिए संकट
Dehraun: डोईवाला शुगर मिल इन दिनों गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। मिल के लिए सबसे बड़ी चिंता का कारण क्षेत्र में लगातार घटता जा रहा गन्ना रकबा है। गन्ना समिति के अंतर्गत आने वाले इलाकों में हर साल करीब डेढ़ सौ बीघा भूमि से गन्ने की खेती खत्म हो रही है, जिससे शुगर मिल को कच्चे माल की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है।
डोईवाला गन्ना समिति क्षेत्र में गन्ने की खेती पहले किसानों की मुख्य आय का स्रोत हुआ करती थी, लेकिन बीते कुछ वर्षों से हालात बदल गए हैं। बढ़ती लागत और घटते मुनाफे के कारण किसान धीरे-धीरे गन्ना छोड़ रहे हैं। इसका नतीजा यह है कि शुगर मिल को कई बार ‘नो केन’ यानी गन्ना उपलब्ध न होने की स्थिति से गुजरना पड़ रहा है।
किसानों का कहना है कि खाद, बीज, डीजल, सिंचाई और मजदूरी की लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि गन्ने का समर्थन मूल्य उसी अनुपात में नहीं बढ़ाया गया। समय पर भुगतान न मिलना भी एक बड़ी समस्या है। इन्हीं कारणों से किसान अब गन्ने की जगह सब्जी, धान और अन्य नकदी फसलों की खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं।
गन्ना समिति के सचिव गांधीराम के अनुसार, पिछले वर्ष डोईवाला समिति ने करीब 12 लाख कुंतल गन्ने की आपूर्ति की थी। हालांकि, इस वर्ष अब तक केवल 6 लाख कुंतल गन्ना ही शुगर मिल को मिल पाया है। यदि यही स्थिति बनी रही तो मिल अपने निर्धारित लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाएगी। इससे पेराई सत्र छोटा हो रहा है और उत्पादन पर सीधा असर पड़ रहा है।
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गन्ने की कमी का असर सिर्फ शुगर मिल तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े मजदूरों, ट्रांसपोर्टरों और स्थानीय कारोबारियों की रोजी-रोटी भी खतरे में पड़ रही है। मिल संचालन प्रभावित होने से सैकड़ों लोगों के रोजगार पर संकट गहरा सकता है।
कम दाम से परेशान किसान
किसान सुरेंद्र राणा का कहना है कि वर्तमान गन्ना मूल्य में लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है। उन्होंने सरकार से गन्ना मूल्य बढ़ाने, समय पर भुगतान सुनिश्चित करने और आधुनिक कृषि तकनीक उपलब्ध कराने की मांग की है। किसानों का मानना है कि जब तक उन्हें उचित मूल्य और भरोसा नहीं मिलेगा, तब तक गन्ना खेती में लौटना मुश्किल है।
गन्ना समिति ने किसानों को उन्नत किस्म के बीज, ड्रिप सिंचाई और वैज्ञानिक खेती के तरीकों के प्रति जागरूक करने की योजना बनाई है। अधिकारियों का मानना है कि यदि उत्पादन लागत कम हो और किसानों को प्रोत्साहन मिले, तो गन्ना रकबा फिर से बढ़ाया जा सकता है।
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डोईवाला जैसे कृषि प्रधान क्षेत्र में गन्ना खेती को स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इसका असर पूरे क्षेत्र की आर्थिक स्थिति पर पड़ सकता है। अब सभी की निगाहें सरकार के फैसले पर टिकी हैं।