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सुरेंद्र कोली की हरिद्वार में मौत (IMG: X)
Noida Nithari Case: नोएडा के बहुचर्चित निठारी कांड में 13 मामलों में फांसी की सजा पा चुके सुरेंद्र कोली की कहानी का अंत बेहद चौंकाने वाला रहा। जिस व्यक्ति को कभी देश के सबसे चर्चित अपराध मामलों में दोषी ठहराया गया था, वही व्यक्ति करीब दो दशक जेल में बिताने के बाद अदालत से बरी होकर बाहर आया। लेकिन रिहाई के कुछ महीनों बाद ही हरिद्वार में उसकी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। 18 सितंबर को खबर आई कि सुरेंद्र कोली ने फंदे से लटककर जान दे दी। अब सवाल उठ रहे हैं कि आखिर जेल से बाहर आने के बाद उसकी जिंदगी कैसी थी और उसने इतना बड़ा कदम क्यों उठाया?
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद 12 नवंबर 2025 को सुरेंद्र कोली ग्रेटर नोएडा की लुक्सर जेल से बाहर आया था। जेल से निकलने के बाद वह कुछ समय दिल्ली में अपने भाइयों के साथ रहा और फिर उत्तराखंड के अल्मोड़ा स्थित अपने गांव मंगरुखाल पहुंचा। लेकिन 2006 के मुकाबले उसकी दुनिया पूरी तरह बदल चुकी थी। उसकी मां का निधन हो चुका था। पत्नी शांति देवी ने 2015 में दूसरी शादी कर ली थी। बेटी की भी शादी हो चुकी थी। जब सुरेंद्र जेल गया था, तब उसकी पत्नी गर्भवती थी। बाद में जन्मे बेटे से उसकी पहली मुलाकात जेल में ही हुई थी।
सुरेंद्र का पुश्तैनी मकान अब खंडहर बन चुका था, इसलिए वह छोटे भाई आनंद कोली के घर रहने लगा। कुछ दिन अल्मोड़ा में मजदूरी करने के बाद वह हरिद्वार के रोशनाबाद पहुंचा। यहां उसने खाने का ठेला लगाने की कोशिश की, लेकिन काम ज्यादा नहीं चला। इसके बाद उसने अपनी पहचान छिपाकर सदाराम नाम से लोगों से संपर्क करना शुरू किया। उसने हरिद्वार में काम और रहने के लिए मदद मांगी। एक परिचित जय कश्यप की मदद से उसे कमरा मिला और फैक्ट्री में गार्ड की नौकरी भी मिल गई। हालांकि, आधार कार्ड मांगने पर उसने पहचान बताने से इनकार किया, जिसके बाद उसे कमरा छोड़ना पड़ा। बाद में उसने एक अपार्टमेंट में गार्ड की नौकरी की, लेकिन वहां भी स्थायी सफलता नहीं मिली।
जानकारी के मुताबिक सुरेंद्र कोली शुगर की बीमारी से भी परेशान था। हरिद्वार में उसका कोई स्थायी ठिकाना नहीं बन पा रहा था। नौकरी और रहने की परेशानियों के बीच वह लगातार तनाव में रहने लगा था। जून में उसने अपने गांव में पूजा-पाठ कराया था, जिसमें उसके तीनों भाई परिवार के साथ पहुंचे थे। इस दौरान उसका 19 साल का बेटा भी पिता के साथ मौजूद था।
15 सितंबर को सुरेंद्र ने हरिद्वार के सप्तऋषि चौकी के पास एक छोटी दुकान किराए पर ली थी। दुकान का किराया 7 हजार रुपए महीना था। उसने दो महीने का एडवांस किराया देकर काम शुरू किया था, लेकिन चार दिन बाद ही उसी दुकान में उसने फंदे से लटककर जान दे दी। शुरुआत में चर्चा थी कि कुंभ की तैयारियों के चलते दुकान अतिक्रमण क्षेत्र में आ रही थी और हटाई जानी थी। हालांकि बाद में सामने आया कि दुकान पहले आंचल दूध के आउटलेट के रूप में इस्तेमाल होती थी और उसे हटाने की कोई जानकारी नहीं थी।
सुरेंद्र की कानूनी मदद करने वाले पूर्व जिला पंचायत सदस्य नारायण सिंह रावत ने बताया कि सुरेंद्र दुकान मालिक से परेशान था। उन्होंने दावा किया कि सुरेंद्र ने फोन कर किराया बढ़ाने और परेशान किए जाने की बात कही थी। नारायण सिंह के मुताबिक सुरेंद्र आर्थिक रूप से कमजोर था और उन्होंने हाल में उसकी 25 हजार रुपए की मदद भी की थी।
सुरेंद्र कोली को 2014 में एक मामले में जिला अदालत, इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से फांसी की सजा मिली थी। राष्ट्रपति के पास भेजी गई दया याचिका भी खारिज हो गई थी। इसके बाद डेथ वारंट तक जारी हो गया था, लेकिन आखिरी समय में सुप्रीम कोर्ट ने फांसी टाल दी। बाद में दया याचिका में देरी के आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उसकी फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। इसके बाद भी कई अन्य मामलों में उसे फांसी की सजा सुनाई गई। वर्ष 2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सबूतों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए उसे बरी कर दिया था। इसके खिलाफ सीबीआई सुप्रीम कोर्ट गई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो, दोष साबित करने के लिए ठोस और भरोसेमंद सबूत जरूरी हैं। अदालत ने कहा कि केवल शक के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
Location : Noida
Published : 20 September 2026, 12:10 PM IST