साइलेंट किलर बन सकती है देर से की गई Pregnancy, जानिए Dr की राय और वो कड़वा सच जो कोई नहीं बताता

बढ़ती उम्र में मां बनना एक बड़ा निर्णय है, लेकिन 35 साल के बाद प्रेगनेंसी में मिसकैरेज और कॉम्प्लीकेशंस का खतरा बढ़ जाता है। डॉ. निरुपमा उपाध्याय से जानिए एग क्वालिटी, क्रोमोसोमल असामान्यताएं और सुरक्षित प्रेगनेंसी के उपायों के बारे में पूरी जानकारी

Post Published By: Tanya Chand
Updated : 15 May 2026, 12:05 PM IST
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New Delhi: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और करियर की प्राथमिकता ने मातृत्व के समय को बदल दिया है। अक्सर महिलाएं 30 या 35 की उम्र के बाद माँ बनने का फैसला लेती हैं। लेकिन क्या यह उम्र शरीर के लिए उतनी ही सहज है जितनी 20 की उम्र होती है? डॉ. निरुपमा उपाध्याय के अनुसार, 35 की उम्र पार करने के बाद प्रेगनेंसी न केवल एक महिला के लिए, बल्कि उसके पूरे परिवार के लिए एक 'मेडिकल चैलेंज' बन सकती है। आइए समझते हैं कि बढ़ती उम्र आपके मातृत्व को कैसे प्रभावित करती है।

क्या है 'एडवांसिंग एज' और क्यों है यह चुनौतीपूर्ण?

डॉ. निरुपमा उपाध्याय बताती हैं कि मेडिकल साइंस में 35 साल या उससे अधिक की उम्र में गर्भवती होने को 'एडवांसिंग एज इन प्रेगनेंसी' कहा जाता है। इस उम्र में सबसे बड़ी समस्या यह है कि महिलाओं के अंडाशय (Ovaries) की कार्यक्षमता कम होने लगती है। न केवल अंडों (Eggs) की संख्या घटती है, बल्कि उनकी गुणवत्ता (Egg Quality) में भी गिरावट आती है। जब एग क्वालिटी खराब होती है, तो गर्भ में पल रहे भ्रूण (Embryo) का विकास ठीक से नहीं हो पाता।

मिसकैरेज और ब्लीडिंग का मुख्य कारण

अक्सर देखा गया है कि उम्र बढ़ने पर गर्भावस्था के दौरान शुरुआती हफ्तों में ब्लीडिंग शुरू हो जाती है, जो अक्सर मिसकैरेज (गर्भपात) का संकेत होती है। डॉ. उपाध्याय के अनुसार, खराब एग क्वालिटी के कारण बनने वाले भ्रूण में क्रोमोसोमल एब्नॉर्मेलिटी (गुणसूत्र संबंधी दोष) होने की संभावना बहुत अधिक होती है। ऐसे भ्रूण में 'ट्राइसोमी' जैसी बीमारियां होने का खतरा रहता है, जिसे शरीर का प्राकृतिक सिस्टम स्वीकार नहीं करता और परिणामस्वरूप गर्भपात हो जाता है।

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बढ़ती उम्र के साथ अन्य स्वास्थ्य समस्याएं (Co-morbidities)

सिर्फ अंडों की गुणवत्ता ही नहीं, 35 की उम्र के बाद महिलाओं का शरीर कई अन्य बीमारियों की चपेट में आने लगता है। इन बीमारियों को 'को-मॉर्बिडिटी' कहा जाता है, जो प्रेगनेंसी को जटिल बना देती हैं। इनमें प्रमुख हैं:

  • हाई ब्लड प्रेशर (Preeclampsia): गर्भावस्था के दौरान बीपी बढ़ने का खतरा।
  • जेस्टेशनल डायबिटीज: प्रेगनेंसी के दौरान होने वाली शुगर की बीमारी।
  • लो बर्थ वेट: बच्चे का वजन कम होना या समय से पहले जन्म (Premature delivery)।
  • ट्विंस और स्टिल बर्थ: जुड़वां बच्चों की संभावना और कभी-कभी गर्भ में ही शिशु की मृत्यु का जोखिम।

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सुरक्षित मातृत्व के लिए क्या करें?

अगर आप 35 के बाद प्रेगनेंसी प्लान कर रही हैं, तो डॉ. उपाध्याय कुछ सावधानियां बरतने की सलाह देती हैं:

1. प्री-कन्सेप्शनल काउंसलिंग: गर्भधारण से पहले ही डॉक्टर से मिलें और अपनी सेहत की पूरी जांच कराएं।
2. जेनेटिक स्क्रीनिंग: भ्रूण में किसी भी क्रोमोसोमल बीमारी का पता लगाने के लिए एडवांस जेनेटिक टेस्ट (जैसे NIPT) करवाएं।
3. लाइफस्टाइल में बदलाव: संतुलित आहार लें, फोलिक एसिड का सेवन शुरू करें और तनाव से दूर रहें।
4. नियमित मॉनिटरिंग: डॉक्टर के संपर्क में रहें ताकि ब्लड प्रेशर और शुगर लेवल को कंट्रोल में रखा जा सके।

Location :  New Delhi

Published :  15 May 2026, 12:02 PM IST

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