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नैनीताल के पास स्थित श्यामखेत टी गार्डन अपनी हरियाली और प्राकृतिक सुंदरता के कारण सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र बनता जा रहा है। पहाड़ों के बीच बसे इस चाय बागान में पर्यटक प्रकृति के बीच सुकून भरे पल बिताने पहुंच रहे हैं। पढ़ें पूरी खबर
नैनीताल: भारत दुनिया के प्रमुख चाय उत्पादक देशों में शामिल है। आम तौर पर असम और पश्चिम बंगाल को चाय उत्पादन के लिए जाना जाता है, लेकिन उत्तर भारत के पहाड़ी इलाकों में भी अब चाय की खेती तेजी से पहचान बना रही है।
पहाड़ियों के बीच फैला चाय बागान
उत्तराखंड के कई पर्वतीय क्षेत्रों में अनुकूल जलवायु और उपजाऊ मिट्टी के कारण चाय की खेती धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है। नैनीताल से करीब 17 किलोमीटर दूर स्थित श्यामखेत क्षेत्र इसका एक प्रमुख उदाहरण है। यहां पहाड़ियों के बीच फैला चाय बागान न केवल उत्पादन के लिए जाना जाता है, बल्कि अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण पर्यटकों को भी आकर्षित करता है। हर साल बड़ी संख्या में लोग यहां की वादियों और हरियाली के बीच चाय के बागानों का नजारा देखने पहुंचते हैं।
खेती की शुरुआत वर्ष 1995 के आसपास
स्थानीय कर्मचारियों के अनुसार, इस क्षेत्र में चाय की खेती की शुरुआत वर्ष 1995 के आसपास हुई थी। लगभग 40 एकड़ क्षेत्र में फैले इस बागान में शुरुआती दौर में दार्जिलिंग से पौधे लाकर लगाए गए थे। समय के साथ यहां चाय की खेती लगातार बढ़ती गई। नैनीताल के आसपास रामगढ़, निंगलाट और गरमपानी जैसे इलाकों में भी अब चाय के पौधे उगाए जा रहे हैं।
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गुणवत्ता को बेहतर बनाने में मदद
विशेषज्ञों का कहना है कि पहाड़ी ढलानों पर खेती होने से पौधों की जड़ों में पानी जमा नहीं होता, जिससे पौधे स्वस्थ रहते हैं। यहां की मिट्टी का पीएच स्तर भी चाय की खेती के लिए अनुकूल माना जाता है, जो इसकी गुणवत्ता को बेहतर बनाने में मदद करता है। चाय तैयार करने की प्रक्रिया भी बेहद सावधानी से की जाती है। पौधों की कोमल पत्तियों और नई कलियों को चुनकर सबसे पहले उनका नमी स्तर कम किया जाता है। इसके बाद मशीनों की मदद से उन्हें रोलिंग और फर्मेंटेशन की प्रक्रिया से गुजारा जाता है। अंत में पत्तियों को सुखाकर ग्रेडिंग की जाती है, जिससे अलग-अलग गुणवत्ता की चाय तैयार होती है।
पहाड़ों की ठंडी जलवायु, साफ वातावरण और उपयुक्त मिट्टी के कारण यहां तैयार होने वाली चाय का स्वाद खास माना जाता है। यही वजह है कि नैनीताल के आसपास के ये चाय बागान धीरे-धीरे खेती के साथ-साथ पर्यटन का भी नया केंद्र बनते जा रहे हैं।