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हरिद्वार के मनसा देवी मंदिर में संत राजनीति, प्रशासन और अदालत आदेश के बीच विवाद बढ़ा। पुजारी और मातृ सदन ने ट्रस्ट पर आरोप लगाए, निष्पक्ष जांच की मांग की और अखाड़ा राजनीति भी मामले में सक्रिय।
मनसा देवी मंदिर विवाद बढ़ा (Img- Internet)
Haridwar: धर्मनगरी हरिद्वार से इस वक्त एक ऐसा धार्मिक-प्रशासनिक टकराव सामने आया है जिसने आस्था, अदालत और अखाड़ा राजनीति तीनों को आमने-सामने ला खड़ा किया है। विवाद का केंद्र विश्व प्रसिद्ध मनसा देवी मंदिर है, जहां के मुख्य पुजारी मंदिर ट्रस्ट के फैसलों और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं।
मंदिर के पुजारियों का कहना है कि अदालत के यथास्थिति आदेश के बावजूद उन्हें हटाने का दबाव बनाया जा रहा है। उनका आरोप है कि संत राजनीति और प्रशासनिक सक्रियता के संयुक्त दबाव से मंदिर का वातावरण बदलने की कोशिश की जा रही है। पुजारियों ने मीडिया के सामने खुलकर ट्रस्ट पर प्रशासनिक मनमानी और निर्णय प्रक्रिया में पक्षपात के गंभीर आरोप लगाए हैं।
विवाद तब और बढ़ गया जब हरिद्वार की आध्यात्मिक-पर्यावरणीय संस्था मातृ सदन ने हस्तक्षेप करते हुए डीएम और एसएसपी को विस्तृत पत्र भेजा। संस्था ने ट्रस्ट के फैसलों, प्रबंधन शैली और प्रशासनिक भूमिका पर सवाल उठाते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है। मातृ सदन के अनुसार, मंदिर का प्रबंधन पारदर्शी और कानून के अनुसार होना चाहिए और इसमें किसी प्रकार की राजनीतिक या दबाव वाली कार्रवाई अस्वीकार्य है।
सूत्रों के अनुसार विवाद की जड़ें अखाड़ा राजनीति तक जाती हैं। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के भीतर चल रहे प्रभाव और वर्चस्व के समीकरणों ने इस प्रकरण को और संवेदनशील बना दिया है। बताया जा रहा है कि 13 अखाड़ों के संतुलन और प्रतिनिधित्व की खींचतान अब सीधे मंदिर प्रबंधन तक असर डाल रही है। वरिष्ठ संत महंत रविंद्र पुरी का नाम भी इस विवाद में सामने आ रहा है, जो इसे और जटिल बना रहा है।
पुजारी का बड़ा बयान
वर्तमान स्थिति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रशासन अदालत के आदेशों को कठोरता से लागू करेगा या संत-संस्थाओं की यह खामोश शक्ति-संग्राम आगे और बड़ा टकराव जन्म देगा। हरिद्वार में अब केवल आस्था ही नहीं, बल्कि अधिकार, नियंत्रण और राजनीतिक प्रभाव की जंग भी सतह पर आ चुकी है।
धार्मिक और प्रशासनिक टकराव ने न केवल हरिद्वार की स्थानीय स्थिति को प्रभावित किया है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चाओं का विषय बना है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि मामले को समय पर नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह अन्य धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन और अखाड़ा राजनीति में भी नए संघर्ष को जन्म दे सकता है।
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मनसा देवी मंदिर विवाद इस बात का प्रतीक बन गया है कि धर्म, न्याय और राजनीति का संगम कभी-कभी किस तरह संवेदनशील और विस्फोटक हो सकता है। हरिद्वार में अब निगाहें प्रशासन, अदालत और अखाड़ा परिषद के निर्णयों पर टिकी हैं, क्योंकि इस प्रकरण का परिणाम न केवल मंदिर प्रबंधन, बल्कि पूरे धार्मिक और प्रशासनिक ढांचे पर असर डाल सकता है।