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भारत-नेपाल सीमा का सोनौली बॉर्डर अब नाइजीरियन पॉपकॉर्न मकई की तस्करी का नया हब बनता जा रहा है। लग्जरी कारों के जरिए हो रही इस तस्करी से सरकार को राजस्व नुकसान और वैध व्यापारियों को झटका लग रहा है। सुरक्षा एजेंसियों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं।
नाइजीरियन पॉपकॉर्न मकई की तस्करी (Img: Google)
Maharajganj: भारत-नेपाल सीमा पर स्थित सोनौली बॉर्डर से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने सुरक्षा व्यवस्था और अवैध व्यापार को लेकर नई बहस छेड़ दी है। यहां नाइजीरियन पॉपकॉर्न मकई की तस्करी तेजी से बढ़ रही है और यह इलाका अब इस अवैध कारोबार का प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है। बिना किसी शुल्क के नेपाल के रास्ते भारत में आ रहे इस माल से सरकारी राजस्व को भारी नुकसान हो रहा है।
हैरानी की बात यह है कि यह तस्करी बेहद सुनियोजित तरीके से की जा रही है, जिसमें लग्जरी वाहनों का इस्तेमाल हो रहा है। इससे न सिर्फ सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं, बल्कि तस्करों के हौसले भी साफ झलक रहे हैं।
जानकारी के अनुसार तस्कर नाइजीरियन मूल के उच्च गुणवत्ता वाले पॉपकॉर्न मकई को लग्जरी कारों में भरकर आसानी से सीमा पार कर रहे हैं। सोनौली की खुली और पारगम्य सीमा का पूरा फायदा उठाया जा रहा है।
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ऐसा भी बताया जा रहा है कि यह माल पहले अंतरराष्ट्रीय रूट से अर्जेंटीना या अन्य देशों से नेपाल पहुंचता है, जिसके बाद इसे भारत में खपाया जाता है। तस्कर इसे मिश्रित मकई के साथ छिपाकर लाते हैं, ताकि जांच एजेंसियों की नजर से बचा जा सके। इसका सीधा असर बाजार पर भी पड़ रहा है। जहां उपभोक्ताओं को सस्ता पॉपकॉर्न मिल रहा है, वहीं वैध व्यापारियों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
इस पूरे मामले में स्थानीय पुलिस और सीमा सुरक्षा एजेंसियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। तस्करों का बेखौफ होकर लग्जरी कारों से सीमा पार करना कई आशंकाओं को जन्म देता है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी तेज है कि क्या इस अवैध धंधे में कहीं न कहीं मिलीभगत है? सोनौली क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था की सुस्ती ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। अगर यही हाल रहा तो तस्करी का यह नेटवर्क और मजबूत हो सकता है।
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पॉपकॉर्न मकई की तस्करी का यह नया ट्रेंड भारत-नेपाल सीमा की कमजोरियों को उजागर कर रहा है। उच्च करों के कारण वैध रूप से आयातित मकई महंगा पड़ता है, जिसका फायदा तस्कर उठा रहे हैं।