हिंदी
जस्टिस भुइयां ने दो टूक कहा कि जजों की नियुक्ति और तबादलों में कार्यपालिका की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि तबादलों का इस्तेमाल किसी जज को “सबक सिखाने” या सजा देने के औजार के रूप में नहीं किया जा सकता। अगर ऐसा होता है, तो यह पूरी संवैधानिक व्यवस्था की आत्मा को कमजोर करता है।
सुप्रीम कोर्ट (Img: Google)
New Delhi: सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा जज ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर ऐसा सवाल उठाया है, जिसने सिस्टम के भीतर चल रही खामोश बहस को सार्वजनिक मंच पर ला दिया है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने हाईकोर्ट के जजों के तबादलों में कार्यपालिका यानी सरकार के कथित दखल पर गंभीर चिंता जाहिर की है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अगर सरकार के खिलाफ फैसले देने वाले जजों को “सजा” के तौर पर इधर-उधर किया गया तो इससे न्यायपालिका की साख और भरोसे को गहरा नुकसान पहुंचेगा।
व्याख्यान में खुलकर रखी बात
पुणे के प्रतिष्ठित आईएलएस लॉ कॉलेज में आयोजित एक व्याख्यान के दौरान जस्टिस भुइयां ने यह मुद्दा उठाया। उन्होंने सवाल किया कि आखिर किसी जज को सिर्फ इसलिए दूसरे हाईकोर्ट में क्यों भेजा जाए, क्योंकि उसने सरकार के लिए असहज या असुविधाजनक आदेश पारित किए हैं। जस्टिस भुइयां के मुताबिक ऐसे तबादले न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा हमला हैं और इससे जजों पर अप्रत्यक्ष दबाव बनता है।
बिना नाम लिए दिया बड़ा संकेत
हालांकि जस्टिस भुइयां ने किसी जज या सरकार का नाम नहीं लिया, लेकिन उनकी टिप्पणी अक्टूबर 2025 के उस घटनाक्रम की ओर इशारा करती मानी जा रही है, जब कॉलेजियम ने जस्टिस अतुल श्रीधरन का तबादला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट कर दिया था। उस समय भी तबादले को लेकर कई सवाल उठे थे और इसे लेकर कानूनी गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई थी।
तबादला सजा का हथियार नहीं
जस्टिस भुइयां ने दो टूक कहा कि जजों की नियुक्ति और तबादलों में कार्यपालिका की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि तबादलों का इस्तेमाल किसी जज को “सबक सिखाने” या सजा देने के औजार के रूप में नहीं किया जा सकता। अगर ऐसा होता है, तो यह पूरी संवैधानिक व्यवस्था की आत्मा को कमजोर करता है।
कॉलेजियम प्रक्रिया पर भी सवाल
उन्होंने हाल के एक मामले का हवाला देते हुए कहा कि जब कॉलेजियम किसी जज के तबादले के प्रस्ताव में केंद्र सरकार के अनुरोध को दर्ज करता है, तो यह एक स्वतंत्र संवैधानिक प्रक्रिया में सरकार के दखल को दर्शाता है। इससे उस व्यवस्था की मूल भावना पर चोट पहुंचती है, जिसे राजनीति और दबाव से दूर रखने के लिए बनाया गया था।
जजों से निडर रहने की अपील
अपने संबोधन के अंत में जस्टिस भुइयां ने न्यायाधीशों से बिना डर और बिना किसी पक्षपात के काम करने की अपील की। उन्होंने कहा कि जजों की पहली और सबसे बड़ी जिम्मेदारी संविधान के प्रति होती है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान की बुनियादी विशेषता है और इसकी रक्षा करना हर जज का कर्तव्य है।