MMDR विवाद में निशिकांत दुबे की एंट्री, हेमंत सोरेन को खुली चुनौती; कोयले से लेकर खनिज राजस्व तक छिड़ी बहस

झारखंड में MMDR संशोधन अधिनियम 2026 को लेकर सियासी टकराव तेज हो गया है। गोड्डा सांसद निशिकांत दुबे ने देवघर में हेमंत सोरेन सरकार के रुख पर सवाल उठाते हुए कानून को समझने की चुनौती दी। वहीं झारखंड सरकार राजस्व और राज्यों के अधिकारों को लेकर कानून का विरोध कर रही है और सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में है।

Post Published By: Asmita Patel
Updated : 22 September 2026, 1:25 PM IST
google-preferred

Deoghar: झारखंड की राजनीति में इन दिनों कोयला और खनिज का मुद्दा सिर्फ जमीन के नीचे नहीं, बल्कि सियासत के ऊपर भी खूब उबाल मार रहा है। MMDR संशोधन कानून को लेकर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सरकार और भाजपा सांसद निशिकांत दुबे आमने-सामने हैं। इसी विवाद के बीच गोड्डा सांसद निशिकांत दुबे ने देवघर में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर हेमंत सोरेन को खुली चुनौती दी। उन्होंने कहा कि पहले कानून को समझिए और फिर झारखंड की जनता को बताइए कि आखिर इससे राज्य को नुकसान कहां हो रहा है। दुबे लगातार आरोप लगा रहे हैं कि MMDR को लेकर राज्य में भ्रम पैदा किया जा रहा है। दूसरी तरफ झारखंड सरकार का कहना है कि संशोधन से राज्य के खनिज राजस्व और वित्तीय अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।

MMDR पर निशिकांत दुबे ने हेमंत सोरेन को क्यों घेरा?

देवघर में मीडिया से बातचीत के दौरान निशिकांत दुबे ने MMDR संशोधन कानून को लेकर झारखंड सरकार के विरोध पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि वह मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को चुनौती देते हैं कि पहले कानून को समझें और उसके बाद जनता के सामने यह स्पष्ट करें कि संशोधन से राज्य को वास्तविक नुकसान क्या हो रहा है। दुबे का तर्क है कि MMDR को लेकर जिस तरह का राजनीतिक माहौल बनाया जा रहा है, उसमें कानून के वास्तविक प्रावधानों और उनके आर्थिक प्रभाव पर चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने खनिज, कोयला और राज्य के राजस्व से जुड़े सवाल भी उठाए।

DUSU रिजल्ट के बाद निशिकांत दुबे का राहुल गांधी पर तंज, बोले- ‘कभी राखी सावंत के साथ मंच साझा करते नजर आएंगे’

कोयले को लेकर भी दुबे पहले दे चुके हैं बयान

MMDR विवाद पर निशिकांत दुबे पिछले कुछ दिनों से लगातार हेमंत सरकार को घेर रहे हैं। 20 सितंबर को दुमका में मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा था कि केंद्र सरकार को झारखंड के कोयले की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने राज्य सरकार को चुनौती देते हुए कहा था कि अगर उसे कोयला उत्पादन को लेकर आपत्ति है तो वह कोयला देना बंद कर दे। रिपोर्ट के मुताबिक, दुबे ने MMDR संशोधन विधेयक को लेकर हेमंत सरकार पर जनता को गुमराह करने का आरोप भी लगाया था। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि जब देश के दूसरे राज्यों में कोयले का उत्पादन हो रहा है तो झारखंड में ही इस मुद्दे को लेकर इतना विरोध क्यों हो रहा है।

हेमंत सरकार की आपत्ति क्या है?

दूसरी तरफ झारखंड सरकार MMDR संशोधन को लेकर अपनी आपत्ति लगातार दर्ज करा रही है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अगस्त में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर प्रस्तावित बदलावों पर पुनर्विचार की मांग की थी। सरकार का तर्क है कि संशोधन से राज्यों की खनिजों पर कर लगाने की शक्ति और उनके वित्तीय हित प्रभावित हो सकते हैं। बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, हेमंत सोरेन ने बताया था कि 2024-25 में खनन से मिलने वाला राजस्व राज्य के गैर-कर राजस्व का करीब 84.9 प्रतिशत था। उन्होंने यह भी कहा था कि राज्य के Mineral Bearing Land Cess से करीब 11 हजार करोड़ रुपये सालाना राजस्व मिलने की उम्मीद थी।

Nishikant Dubey

MMDR विवाद में निशिकांत दुबे की एंट्री (IMG: Dynamite News)

1.36 लाख करोड़ रुपये का विवाद भी जुड़ा

MMDR विवाद सिर्फ भविष्य में मिलने वाले खनिज राजस्व तक सीमित नहीं है। इसके साथ झारखंड के पुराने वित्तीय दावे का मुद्दा भी जुड़ा हुआ है। राज्य सरकार करीब 1.36 लाख करोड़ रुपये के बकाये का दावा करती रही है। इसमें कोयला रॉयल्टी और अन्य खनिज संबंधी वित्तीय दावे शामिल हैं। सितंबर में झारखंड सरकार ने स्पष्ट किया कि संशोधित कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाएगा और पुराने बकाये के दावे को भी कानूनी तरीके से आगे बढ़ाया जाएगा।

7 साल से जिम्मेदारी नहीं निभाई गई… देवघर पहुंचते ही निशिकांत दुबे ने श्राइन बोर्ड पर उठाए बड़े सवाल, सरकार पर निशाना साधा

सरकार और भाजपा का अलग-अलग तर्क

इस विवाद में मिनरल सेस भी बड़ा मुद्दा बन गया है। झारखंड सरकार का कहना है कि राज्य ने खनिज संपदा से जुड़े राजस्व को बढ़ाने के लिए कानून बनाया था और इससे राज्य को बड़ी आय की उम्मीद थी। सरकार ने अनुमानित राजस्व नुकसान को लेकर भी चिंता जताई है। वहीं निशिकांत दुबे संशोधन कानून को लेकर राज्य सरकार के तर्कों पर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि अगर कानून झारखंड के हितों के खिलाफ है तो सरकार को स्पष्ट कानूनी और आर्थिक आधार के साथ जनता के सामने आना चाहिए।

दूसरे राज्यों का उदाहरण देकर भी सवाल उठा रहे दुबे

निशिकांत दुबे अपने हालिया बयानों में लगातार दूसरे खनिज उत्पादक राज्यों का उदाहरण दे रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया है कि अगर MMDR संशोधन से इतना बड़ा नुकसान होने वाला है तो दूसरे राज्यों में भी इसी तरह की स्थिति क्यों नहीं दिखाई दे रही। उनका यह तर्क फिलहाल राजनीतिक बहस का हिस्सा है, जबकि झारखंड सरकार अपने पक्ष को कानूनी और वित्तीय अधिकारों से जोड़कर देख रही है। ऐसे में दोनों पक्षों के दावों का अंतिम असर और कानूनी स्थिति अदालत में चुनौती तथा आगे की न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगी।

Location :  Deoghar

Published :  22 September 2026, 1:21 PM IST

Advertisement