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कर्नाटक के डिप्टी सीएम डी.के. शिवकुमार ने दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात की, जिससे राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। असम मुद्दे पर बनी जांच समिति में उनकी अहम भूमिका है। वहीं, कर्नाटक में ढाई साल के मुख्यमंत्री फॉर्मूले को लेकर अटकलें फिर तेज हो गई हैं।
सोनिया गांधी से मिले डिप्टी सीएम डी के शिवकुमार
New Delhi: कर्नाटक की पॉलिटिक्स एक बार फिर गरमा गई है। राज्य के डिप्टी चीफ मिनिस्टर डी.के. शिवकुमार इस समय दिल्ली के दौरे पर हैं और लगातार कांग्रेस की टॉप लीडरशिप से मिल रहे हैं। दो दिन पहले उन्होंने प्रियंका गांधी से मुलाकात की थी और अब कांग्रेस प्रेसिडेंट सोनिया गांधी से उनकी मुलाकात ने पॉलिटिकल गलियारों में नई चर्चाओं को हवा दे दी है।
मीडिया से बात करते हुए डी.के. शिवकुमार ने कहा कि सोनिया गांधी के साथ उनकी मीटिंग का मेन एजेंडा असम का पॉलिटिकल मुद्दा था। असम के चीफ मिनिस्टर हिमंत बिस्वा शर्मा ने कांग्रेस MP गौरव गोगोई पर पाकिस्तान से लिंक होने का आरोप लगाया था। इस आरोप के बाद कांग्रेस ने मामले की जांच के लिए तीन मेंबर की कमेटी बनाई। इस कमेटी में डी.के. शिवकुमार और छत्तीसगढ़ के पूर्व चीफ मिनिस्टर भूपेश बघेल शामिल हैं। कमेटी अपनी रिपोर्ट कांग्रेस प्रेसिडेंट को सौंपेगी।
हालांकि मीटिंग का ऑफिशियल एजेंडा असम बताया जा रहा है, लेकिन कर्नाटक की पॉलिटिक्स को लेकर भी अटकलें तेज हो गई हैं। जब पत्रकारों ने शिवकुमार से कर्नाटक में संभावित लीडरशिप चेंज के बारे में पूछा, तो उन्होंने बस इतना कहा, "समय बताएगा।"
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बता दें कि जब कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बनी थी, तो मुख्यमंत्री पद के लिए ढाई साल के फॉर्मूले पर बात हुई थी। यह व्यवस्था सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार के बीच बैलेंस बनाए रखने के लिए की गई थी। अब, जब सरकार के कार्यकाल का एक अहम दौर पूरा हो गया है, तो सत्ता परिवर्तन की संभावना को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
कर्नाटक में कांग्रेस कार्यकर्ताओं का एक बड़ा हिस्सा खुलकर डी.के. शिवकुमार के समर्थन में आ रहा है। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, लीडरशिप में बदलाव को लेकर हाईकमान पर दबाव बढ़ रहा है। हालांकि पार्टी लीडरशिप की तरफ से अभी तक कोई ऑफिशियल बयान जारी नहीं किया गया है, लेकिन दिल्ली में चल रही मीटिंग्स को राजनीतिक तौर पर अहम माना जा रहा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में कर्नाटक की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। अगर हाईकमान ढाई साल के फॉर्मूले को लागू करता है, तो राज्य में लीडरशिप में बदलाव तय माना जा रहा है। फिलहाल सभी की निगाहें कांग्रेस अध्यक्ष और केंद्रीय नेतृत्व के अगले कदमों पर टिकी हैं।