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नैनीताल के पास पटवाडांगर, वह ऐतिहासिक स्थल जहां भारत में पहली स्मॉल पॉक्स वैक्सीन का उत्पादन हुआ और देश में बीमारी पर जीत मिली। जिसने भारत में छोटी चेचक की बीमारी को मिटाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
जैव प्रौद्योगिकी संस्थान
Nainital: नैनीताल मुख्यालय के कुछ दूरी पर स्थित पटवाडांगर एक ऐतिहासिक केंद्र है, जिसने भारत में छोटी चेचक की बीमारी को मिटाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। यह स्थल शहर से लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर है और पहले यहां राज्य स्तर का वैक्सीन निर्माण केंद्र मौजूद था। पूरे देश में सबसे पहले यहीं छोटी चेचक की खुराक तैयार की गई थी। बाद में एंटी-रेबीज और टिटनेस के टीके का उत्पादन भी यहीं शुरू हुआ।
आज यह जैव प्रौद्योगिकी संस्थान के रूप में जाना जाता है। इसकी स्थापना 1903 में हुई थी। स्थानीय लोग बताते हैं कि पहले इसे राज्य वैक्सीन केंद्र के नाम से जाना जाता था। इसी संस्थान में तैयार वैक्सीन ने देश भर में छोटी चेचक से लड़ाई में अहम भूमिका निभाई।
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1957 में यहां एंटी रेबीज वैक्सीन का निर्माण शुरू हुआ। इसके बाद टिटनेस की खुराक भी इसी जगह पर बननी शुरू हुई। 2003 तक यहां वैक्सीन बनाई जाती रही, लेकिन पुरानी तकनीक और विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार आवश्यक उच्च स्तरीय उत्पादन सुविधाओं की कमी के कारण इसका निर्माण बंद करना पड़ा।
2005 में राज्य सरकार ने इसे पंतनगर स्थित कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अधीन कर दिया और इसे जैव प्रौद्योगिकी संस्थान के रूप में विकसित किया। इस क्षेत्र का नाम पटवाडांगर वहां पाए जाने वाले विशेष प्रकार के पटवा पेड़ के कारण पड़ा, जो पूरे देश में यहीं सबसे अधिक मिलते हैं।
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एक समय दुनिया की सबसे घातक बीमारियों में शामिल रहा स्मॉलपॉक्स (चेचक) एक बार फिर चर्चा में है। हालांकि इस बीमारी को 1980 में पूरी तरह खत्म घोषित कर दिया गया था, लेकिन हाल के वर्षों में इसे लेकर वैश्विक स्तर पर सतर्कता बढ़ाई गई है। स्मॉलपॉक्स एक संक्रामक बीमारी थी, जो Variola virus के कारण फैलती थी। इसमें तेज बुखार के बाद शरीर पर दाने और फफोले हो जाते थे, जो गंभीर रूप ले सकते थे।
स्मॉलपॉक्स बेहद तेजी से फैलने वाली बीमारी थी, जिसमें:
तेज बुखार
शरीर में दर्द
चेहरे और शरीर पर फफोले
गंभीर मामलों में मौत तक हो जाती थी और कई लोग स्थायी दाग के साथ बचते थे।