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प्रधान चुनाव टालने के सियासी असर
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों के चुनाव अगले 6 माह चक टल चुके हैं। ग्राम प्रधानों को अगले 6 माह तक प्रशासक के तौर पर कार्य करने को कहा गया है लेकिन वे कोई बड़े और नीतिगत फैसले नहीं ले सकेंगे। प्रधानों के अगल चुनाव कब होंगे, इसका पता नहीं लेकिन सरकार के इस फैसले ने राजनीतिक रूप ले लिया है और चर्चाएं चल रही है कि इससे किसको नफा-नुकसान होने वाला है।
विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव चुनाव टालने के बाद से योगी सरकार पर हमलावर हैं। उनका कहना है कि भाजपा ने हार से भयभीत होकर चुनाव टाले। गांवों और आम आदमी के हकों को नजरअंदाज किया गया। उनका ये भी कहना है कि राज्य के लोग अगले चुनाव में सरकार को सबक सिखाएंगे।
चुनाव के ऐलान में केवल 8 माह का वक्त
विपक्षी दल के प्रमुख नेता और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री होने के तौर पर स्वाभाविक है कि अखिलेश यादव सरकार की खिंचाई करेंगे और भाजपा को घेरेंगे। लेकिन दलगत राजनीति से इतर यूपी के गांव और गलियों में इस बात को लेकर जबरदस्त बहस हो रही है कि आखिर योगी सरकार का यह फैसला भाजपा के लिये कितना फायदेमंद होगा। दरअसल, यूपी चुनाव के ऐलान में केवल 8 माह का वक्त रह गया है जबकि प्रशासक के रूप में ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 6 माह के लिये बढ़ाया गया है। मतलब कि चुनाव के ऐलान से ठीक दो माह पहले तक।
क्या एक साथ होगें चुनाव?
ग्राम प्रधानों का कार्यकाल बढ़ाना और प्रशासक के तौर पर उनके कार्यकाल की समाप्ति की टाइमिंग सियासी तौर पर बेहद महत्वपूर्ण है। सवाल यह है कि जब सरकार चुनाव में जाने की तैयारी कर रही होगी तो पंचायत चुनाव भी उसके सामने होंगे। दूसरी तरफ देश में पिछले कई महीनों से एक देश एक चुनाव की बहस चल रही है। ऐसे में मुमकिन है कि एक देश एक चुनाव का पहला प्रयोग उत्तर प्रदेश से। इस प्रयोग के तहत पहली बार यूपी में पंचायत और विधानसभा चुनाव एक साथ हो सकते हैं। यह प्रयोग हालांकि बेहद छोटा माना जा सकता है लेकिन इसके सियासी प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता। यदि ऐसा होता है तो यह प्रयोग देश की राजनीति में एक मील का पत्थर साबित होगा।
सियासी गुणा-गणित की चर्चा
कई तरह की अटकलों और सियासी गुणा-गणित की चर्चाओं के बीच यूपी में ग्राम प्रधानों के चुनाव टालने के सियासी नफा-नुकसान की बातें हो रहीं है। प्रधानों के चुनाव टालने के बाद और प्रशासक के रूप में उनका कार्यकाल बढ़ाये जाने की घोषणा के तुरंत बाद यूपी से कई ऐसे वीडियोज सामने आये, जिनमें मौजूदा प्रधान जश्न मनाते दिखे। उन्होंने योगी सरकार के इस फैसले को न केवल सराहा बल्कि अपना समर्थन भी दिया। इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि मौजूदा ग्राम प्रधान यानि जिनको 6 माह के लिये प्रशासक बनाया गया हैं, उनमें अधितक योगी सरकार से हैं। ऐसे प्रधानों का साथ मिलने का सीधा फायदा भाजपा को होता हुआ दिख रहा है। यूपी चुनाव में योगी को इन प्रधानों का समर्थन मिल सकता है, जो राज्य में भाजपा की जमीन को और मजबूत करेंगे।
सरकार का यह फैसला एक प्रकार से बड़ी बाधा
राज्य में ऐसे भी कई ऐसे लोग हैं, जो पिछले कुछ महीनों से ग्राम प्रधन का चुनाव लड़ने की तैयारियां कर रहे थे लेकिन योगी सरकार के इस फैसले से उनके सपने चकनाचूर हो गये हैं। प्रधान बनने के उनके रास्ते में योगी सरकार का यह फैसला एक प्रकार से बड़ी बाधा साबित हुआ। स्वाभाविक है कि ऐसे लोग योगी सरकार के इस फैसले से खुश नहीं हैं और आगामी चुनाव में सरकार को उनकी नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है।
दूसरी तरफ, सपा प्रमुख अखिलेश यादव, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस मुद्दे को लेकर जिस तरह से सरकार को घेर रहे हैं, वह भाजपा और योगी सरकार के लिये असहज स्थिति है। प्रधानों के चुनाव को लेकर विपक्षी दलों का सरकार पर हमलावर होना भाजपा के लिये एक बड़ी चुनौती भी है। नाराज लोगों और विपक्ष के हमलों से सरकार कैसे निपटती है, यह देखने वाली बात होगी।
Location : Lucknow
Published : 28 May 2026, 6:44 PM IST
Topics : Pradhan UP Elections UP Politics Yogi Government