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उत्तर प्रदेश में बढ़ते गुमशुदा मामलों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच सख्त हो गई है। 1.08 लाख लापता लोगों के आंकड़ों के बीच कोर्ट ने सरकार और DGP को तलब कर जवाब मांगा है।
Allahabad High Court
Lucknow: उत्तर प्रदेश में लगातार बढ़ते गुमशुदा लोगों के मामलों ने अब कानून की चौखट तक ज़ोरदार दस्तक दे दी है। हजारों परिवार अपने अपनों की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं, थानों के चक्कर काट रहे हैं और हर रोज़ एक नई उम्मीद के साथ जागते हैं, लेकिन हाथ सिर्फ मायूसी लग रही है। इसी गंभीर हालात को देखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने सख्त रुख अपनाया है और राज्य सरकार से सीधा जवाब मांगा है। हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि अब यह मामला सिर्फ पुलिसिंग का नहीं, बल्कि इंसानी ज़िंदगियों और मानवाधिकारों का सवाल बन चुका है।
हाईकोर्ट का बड़ा आदेश
न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति ए.के. चौधरी की खंडपीठ ने स्वतः संज्ञान लेकर इस पूरे मामले को जनहित याचिका के रूप में दर्ज किया और अपर मुख्य सचिव (गृह) व पुलिस महानिदेशक को 23 मार्च को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होने का आदेश दिया है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि प्रदेश में गुमशुदा व्यक्तियों से जुड़े सभी आंकड़े, रिकॉर्ड और रिपोर्ट अगली सुनवाई में पेश किए जाएं, ताकि यह साफ हो सके कि सिस्टम आखिर काम क्यों नहीं कर पा रहा है।
दो साल में एक लाख से ज्यादा लोग लापता
सुनवाई के दौरान सामने आए आंकड़े बेहद डराने वाले हैं। पिछले करीब दो सालों में उत्तर प्रदेश में 1 लाख 8 हजार 300 लोग लापता हुए हैं, जिनकी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज है। इनमें से पुलिस अब तक सिर्फ करीब 9 हजार 700 लोगों का ही पता लगा सकी है। यानी हजारों लोग अब भी लापता हैं और उनके परिवार अंधेरे में जी रहे हैं। कोर्ट ने इस स्थिति को बेहद गंभीर और चिंताजनक बताया है।
लखनऊ की गलियों में तलाशते परिवार
प्रदेश की राजधानी लखनऊ भी इससे अछूती नहीं है। इंदिरानगर के तकरोही इलाके से 18 साल की एक लड़की 29 जनवरी से लापता है, परिवार एक युवक पर बहला-फुसलाकर ले जाने का आरोप लगा रहा है, दोनों के फोन बंद हैं और कोई सुराग नहीं। दुबग्गा के शेखपुरवा इलाके से ई-रिक्शा चालक जमील अहमद दो महीने से गायब है। वहीं चिनहट इलाके के रहने वाले विक्रम प्रसाद का बेटा जुलाई 2024 से लापता है, महीनों बीत गए लेकिन कोई खबर नहीं।
23 मार्च को सरकार को देना होगा जवाब
हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगली सुनवाई में सरकार को बताना होगा कि लापता लोगों की तलाश के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए हैं और बरामदगी की दर इतनी कम क्यों है। कोर्ट का मानना है कि यह मामला कानून-व्यवस्था से कहीं आगे बढ़कर मानवाधिकारों से जुड़ा गंभीर संकट बन चुका है।