इस्लाम किया कबूल तो मिला लाखों का इनाम, अब हाईकोर्ट ने भी लगाई मुहर

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दो बहनों की व्यक्तिगत आजादी से जुड़े मामले में बड़ा आदेश दिया है। दोनों महिलाओं ने अदालत में कहा कि उन्होंने अपनी इच्छा से इस्लाम अपनाया था। कोर्ट ने उनकी कथित हिरासत को अधिकारों का उल्लंघन माना।

Post Published By: Nidhi Kushwaha
Updated : 12 August 2026, 7:44 PM IST
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Prayagraj: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दो बालिग बहनों की व्यक्तिगत आजादी से जुड़े मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने माना कि दोनों महिलाओं को उनकी इच्छा के खिलाफ पिता के घर में रखना उनकी स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन था। मामले में हाईकोर्ट ने पिता और उत्तर प्रदेश सरकार को संयुक्त रूप से 25 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है। दोनों महिलाओं ने अदालत में कहा था कि उन्होंने अपनी इच्छा से इस्लाम अपनाया है।

अदालत में दोनों बहनों ने क्या कहा?

मामला दीया भाटिया उर्फ जोया (20) और अंशु भाटिया उर्फ अमीना अंशु भाटिया (35) से जुड़ा है। दोनों ने हाईकोर्ट का रुख करते हुए अपनी स्वतंत्रता की मांग की थी। उनका कहना था कि उन्होंने अपनी आस्था और अंतरात्मा की आवाज पर इस्लाम धर्म अपनाया।

अंशु ने वर्ष 2020 में, जबकि दीया ने 2021 में धर्म परिवर्तन किया था। सुनवाई के दौरान जस्टिस संदीप जैन ने दोनों महिलाओं से सीधे बातचीत की। अदालत ने उनके जवाबों को स्पष्ट और स्वाभाविक पाया। कोर्ट के सामने ऐसा कोई संकेत नहीं आया कि दोनों ने डर, दबाव, लालच या किसी अनुचित प्रभाव में आकर अपना धर्म बदला था।

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बालिग व्यक्ति को अपने फैसले का अधिकार

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को महत्वपूर्ण माना। अदालत के मुताबिक, जब कोई व्यक्ति बालिग है तो उसे अपने जीवन से जुड़े अहम फैसले लेने का अधिकार है। इसमें उसकी धार्मिक आस्था, रहने की जगह और निजी जीवन से जुड़े निर्णय भी शामिल हैं। अदालत ने यह भी माना कि दोनों महिलाओं को उनकी इच्छा के विरुद्ध घर में रखना उनकी आजादी पर गंभीर असर डालता है। इसी आधार पर कोर्ट ने उनके अधिकारों की रक्षा की जरूरत पर जोर दिया।

पिता की शिकायत में धर्म परिवर्तन का आरोप

मामले में राज्य सरकार की ओर से पिता द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर का हवाला दिया गया। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि हिंदू धर्म से इस्लाम में कथित तौर पर जबरन और धोखे से धर्म परिवर्तन कराया गया। जांच के दौरान भारतीय न्याय संहिता यानी BNS की धाराओं के साथ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 की धाराएं भी जोड़ी गईं। सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि मामला किसी बड़ी साजिश का हिस्सा हो सकता है और महिलाओं को छोड़ने से जांच प्रभावित हो सकती है।

हालांकि हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि धर्म परिवर्तन से जुड़ी एफआईआर की जांच कानून के अनुसार चलती रहेगी। अदालत की ओर से मामले में की गई टिप्पणियों को जांच में बाधा नहीं माना जाएगा।

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यूपी सरकार की भूमिका पर भी कोर्ट की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने राज्य की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि महिलाओं की स्वतंत्रता की रक्षा करने के बजाय सरकारी तंत्र की कार्रवाई से कथित हिरासत जारी रही। इसी को संवैधानिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन मानते हुए कोर्ट ने मुआवजे का आदेश दिया। 25 लाख रुपये की राशि पिता और उत्तर प्रदेश सरकार को संयुक्त रूप से देनी होगी। यह रकम दोनों बहनों के बीच बराबर बांटी जाएगी और भुगतान के लिए आठ सप्ताह का समय दिया गया है।

एफआईआर की जांच रहेगी जारी

इस फैसले का एक अहम पहलू यह भी है कि हाईकोर्ट ने महिलाओं की व्यक्तिगत आजादी को लेकर राहत दी, लेकिन धर्म परिवर्तन से जुड़े आरोपों की जांच को खत्म नहीं किया। यानी एफआईआर में लगाए गए आरोपों की कानूनी जांच अपने रास्ते पर चलती रहेगी।

Location :  Prayagraj

Published :  12 August 2026, 7:44 PM IST

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