धर्म बदला तो पिता ने रोका रास्ता? इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले से मचा हड़कंप

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने धर्म परिवर्तन करने वाली दो सगी बहनों की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि बालिग व्यक्ति को अपनी आस्था, धर्म, निवास और जीवन से जुड़े फैसले खुद लेने का अधिकार है।

Post Published By: Nitin Parashar
Updated : 11 August 2026, 6:51 AM IST
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Prayagraj : धर्म परिवर्तन करने वाली दो सगी बहनों को पिता की ओर से हिरासत में रखे जाने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी बालिग व्यक्ति को अपनी आस्था, धर्म, रहने की जगह और जीवन से जुड़े फैसले खुद लेने का संवैधानिक अधिकार है। माता-पिता अपनी संतान के फैसलों से असहमति जता सकते हैं, लेकिन उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को खत्म नहीं कर सकते।

इस टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने दोनों बहनों को अपनी पसंद के स्थान और व्यक्ति के साथ रहने की स्वतंत्रता दे दी। साथ ही अदालत ने पिता और उत्तर प्रदेश सरकार को संयुक्त रूप से दोनों बहनों को 25 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है।

बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर हुई सुनवाई

यह आदेश इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकल पीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। आगरा निवासी इन दोनों बहनों की ओर से अदालत में याचिका दाखिल की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि दोनों बहनों ने अपनी इच्छा से इस्लाम धर्म स्वीकार किया है, लेकिन इससे नाराज होकर उनके माता-पिता ने उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध घर में रोक रखा है।

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पुलिस ने कोर्ट के आदेश पर कराया पेश

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के आदेश पर पुलिस ने दोनों बहनों को अदालत के सामने पेश किया। कोर्ट में दोनों ने बताया कि उन्होंने अपनी इच्छा और स्वतंत्र निर्णय से इस्लाम धर्म अपनाया है। बहनों ने अदालत को यह भी बताया कि वे अपनी मर्जी से जीवन जीना चाहती हैं और उन्हें अपनी पसंद के अनुसार रहने की आजादी मिलनी चाहिए।

बालिग व्यक्ति के अधिकारों पर कोर्ट की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि बालिग व्यक्ति को अपने धर्म और जीवन से जुड़े निर्णय लेने का पूरा अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि केवल माता-पिता होने के आधार पर किसी वयस्क संतान की स्वतंत्रता को सीमित नहीं किया जा सकता।

अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति की धार्मिक मान्यता या व्यक्तिगत पसंद से असहमति होना अलग बात है, लेकिन उसे जबरन नियंत्रित करना कानून के तहत उचित नहीं है।

मुआवजे के आदेश से चर्चा में आया मामला

हाईकोर्ट ने दोनों बहनों की स्वतंत्रता सुनिश्चित करते हुए पिता और राज्य सरकार को संयुक्त रूप से 25 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है। कोर्ट के इस फैसले के बाद धर्म, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और बालिग व्यक्ति के अधिकारों को लेकर बहस तेज हो गई है।

Location :  Prayagraj

Published :  11 August 2026, 6:51 AM IST

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