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नोएडा सेक्टर 168 की सनवर्ल्ड अरिस्टा सोसायटी में 12वीं छात्र आर्यन ने पढ़ाई के तनाव के चलते टावर से कूदकर आत्महत्या कर ली। पुलिस ने पोस्टमार्टम कर शव स्वजन को सौंप दिया।
प्रतीकात्मक फोटो (सोर्स: इंटरनेट)
Noida: सेक्टर-168 स्थित सनवर्ल्ड अरिस्टा सोसायटी में 12वीं कक्षा का छात्र आर्यन ने टावर की छत से कूदकर अपनी जान दे दी। घटना की जानकारी मिलते ही पूरे सोसायटी में शोक की लहर दौड़ गई। शुरुआती जांच में पता चला है कि पढ़ाई को लेकर तनाव के चलते छात्र ने यह कदम उठाया।
छत पर मिला बैग और नोट
पुलिस ने बताया कि टावर की छत पर छात्र का बैग मिला है। मोबाइल के नोटपैड में “सॉरी मम्मी” और “लव यू मम्मी” लिखा हुआ संदेश भी बरामद हुआ है। यह संकेत है कि छात्र ने आत्महत्या करने से पहले अपने माता-पिता को अलविदा कहने की कोशिश की थी।
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घटना का क्रम
आर्यन अपने परिवार के साथ 10वीं मंजिल पर रहते थे। वह दिल्ली के साकेत एम ब्लॉक स्थित एमिटी इंटरनेशनल स्कूल में 12वीं कक्षा में पढ़ाई कर रहे थे। शनिवार को उनका प्रैक्टिकल था। दोपहर करीब एक बजे प्रैक्टिकल देने के बाद वह सोसायटी पहुंचे। लेकिन वह अपने टावर में जाने के बजाय टावर नंबर 10 की ओर चले गए। लिफ्ट से ऊपरी मंजिल की ओर जाते हुए उन्होंने ‘विक्टरी का साइन’ बनाया और फिर बहुमंजिला इमारत से कूद गए।
परिवार और पुलिस की प्रतिक्रिया
जानकारी मिलने पर आर्यन की मां तुरंत मौके पर पहुंचीं। अस्पताल ले जाने पर चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। पिता ऋषि, जो जर्मनी में कारोबार के सिलसिले में थे, रविवार को नोएडा पहुंचे। एडीसीपी मनीषा सिंह ने बताया कि फील्ड यूनिट बुलाकर मौके से साक्ष्य जुटाए गए हैं। शुरुआती जांच में तनाव के चलते आत्महत्या की आशंका जताई जा रही है।
आर्यन की पढ़ाई और मानसिक स्थिति
स्थानीय लोगों और परिवार से मिली जानकारी के अनुसार, आर्यन पढ़ाई में मेद्यावी था। उसके पिता एक्सपोर्ट कारोबारी हैं। परिवार में उसकी एक बड़ी बहन भी है, जो मेडिकल की पढ़ाई कर रही है। पुलिस यह भी पता कर रही है कि अंतिम समय में आर्यन किससे बातचीत कर रहा था।
मनोचिकित्सक की सलाह
मनोचिकित्सक डॉ. संजीव त्यागी ने कहा कि माता-पिता की उम्मीद और बच्चों के प्रदर्शन के बीच गैप तनाव पैदा करता है। जैसे-जैसे बोर्ड परीक्षा नजदीक आती है, तनाव बढ़ता है। भावनात्मक रूप से कमजोर बच्चे आत्मघाती कदम उठा सकते हैं। उन्होंने माता-पिता से अपील की है कि बच्चों से सकारात्मक वार्तालाप करें, और जरूरत पड़ने पर हेल्पलाइन या मनोचिकित्सक से परामर्श लें।