भारी तनाव के बीच 50 घंटे बाद हुआ जितेन्द्र यादव का अंतिम संस्कार लेकिन पुलिसिया पैंतरेबाजी से सवाल अब भी कायम

डीएन ब्यूरो

महिला जिला पंचायत सदस्य के पुत्र जितेन्द्र यादव की निर्मम हत्या के बाद मुकदमा लिखने में पुलिस ने जो खेल किया उसे देख हर कोई हैरान रह गया कि कैसे पुलिस सत्ता के दबाव में काम कर रही है। दो दिनों से परेशान परिजनों की मांगों पर प्रशासन के घुटने टेकने के बाद लाश का अंतिम संस्कार कर दिया गया। इस बीच लगातार 50 घंटे तक परिजनों और ग्रामीणों के भारी विरोध, नारेबाजी, हाय-हाय, मुर्दाबाद और सड़क जाम से पुलिस अफसरों के पसीने छूट गये। पुलिस महकमे के बड़े अफसरों की नादानियों के बाद अब यह मामला ऐसे मोड़ पर आ खड़ा हुआ है कि इसमें पुलिस की तनिक भी पैंतरेबाजी भविष्य में बड़ी अनहोनी घटना की वजह बन सकती है। डाइनामाइट न्यूज़ एक्सक्लूसिव:


महराजगंज: दो महीने पहले हुए जानलेवा हमले के बाद जिस पुलिसिया नादानी का परिचय जिले के पुलिस महकमे के बड़े अफसरों ने दिया उसका नतीजा हत्या के रुप में सामने आया। हत्या के बाद से मुकदमा लिखने के नाम पर पुलिस की पैंतरेबाजी से कई सवाल उठ खड़े हुए हैं। जितने मुंह, उतनी बात, लोग सवाल पूछ रहे हैं कि पुलिस ने अगर अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभायी और रंजिश के चलते आगे भी गैंगवार में हत्याओं का दौर जारी रहा तो फिर क्या इसके जिम्मेदार वर्तमान पुलिस अफसर नहीं होंगे? क्यों पुलिस सत्ता के दबाव में काम कर रही है? सबसे बड़ा डर लोगों को यह है कि पुलिसिया नादानी के चलते यह रंजिश कहीं जातिगत संघर्ष का रंग न अख्तियार कर ले।

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जितेंद्र यादव के अंतिम संस्कार के दौरान मौजूद लोग

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सोमवार को ड़ेढ बजे हत्या होती है और अंतिम संस्कार बुधवार को करीब साढ़े तीन बजे होता है। इस बीच परिजन चीख-चीख कर कहते हैं कि जब तक हमारी मांगे पूरी नहीं होंगी तब तक वे अंतिम संस्कार नहीं करेंगे। इस बीच सारे मामले पर राजनीति जमकर हुई। सपा, कांग्रेस के प्रमुख नेता गांव पहुंचे और कहने लगे कि यदि इस मामले में परिजनों की मांग के अनुरुप निष्पक्ष कार्यवाही नही हुई तो वे बड़ा आंदोलन करेंगे। 


पुलिस ने सबसे बड़ा खेल किया मृतक की पत्नी की ओर से दी गयी सबसे पहली दो पन्ने की तहरीर को न दर्ज करके। यहीं से सारे विवाद की शुरुआत हुई। न जाने कैसे एक पन्ने की दूसरी तहरीर पर मुकदमा लिखा गया। परिजन इस तहरीर पर लिखे गये मुकदमे पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। जब विवाद बढ़ा तो पुलिस वालों ने कहा कि हम आगे की विवेचना में डीएम के नाम से लिखी गयी तीसरी तहरीर की बातों को शामिल करेंगे। इससे साफ हो गया कि पुलिस अपनी पैंतरेबाजी में कामयाब हो गयी और सत्ता के दबाव में जैसा चाहती थी वैसा कर ले गयी लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि 'लम्हों ने खता की और सदियों ने सजा पायी'

जितेंद्र यादव का अंतिम संस्कार करते परिजन

पुलिस इसी तरह सत्ता के दबाव में गरीबों को सताने में और अपराधियों को बचाने में जुटी रहेगी तो फिर गरीबों की सुनेगा कौन, कैसे उन्हें न्याय मिलेगा? 

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सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि दो महीने पहले जितेन्द्र यादव पर हुए जानलेवा हमले के बाद पुलिस ने सत्ता के दबाव में काम नहीं किया होता तो शायद आज किसी की जान नहीं जाती।

एसडीएम का डीएम को प्रेषित मांग पत्र का कवरिंग लेटर

हैरान करने वाली बात तो ये है कि दो महीने पहले हुए जानलेवा हमले के बाद पुलिस ने जो 307 का केस दर्ज किया था उसमें 6 लोग मुलजिम बनाये गये लेकिन एक की भी गिरफ्तारी पुलिस नहीं कर पायी। इनमें से तीन लोगों ने अपनी मर्जी और समय से कोर्ट में सरेंडर किया। इस मामले में तीन लोग अभी भी पुलिसिया गिरफ्त से बाहर है। नतीजा अपराधियों के हौसले सत्ता और पुलिस के गठजोड़ में बढ़ते चले गये और आखिरकार हत्यारे जितेन्द्र को गोलियों से भून निर्मम हत्या करने में सफल हो गये।

परिजनों का मांग पत्र 

यहां एक और बात चौंकाने वाली है कि जैसे ही हत्या हो जाती है उसके तुरंत बाद दो लोगों को पुलिस अचानक गिरफ्तार कर लेती है। पुलिस का यह खेल किसी के गले नहीं उतर रहा है कि जो अभियुक्त 307 के केस में दो महीने से फरार थे और पुलिस गिरफ्तार नहीं कर पा रही थी वे अचानक हत्या के तुरंत बाद कैसे पुलिस के राडार में आ गये? कहीं ये सब पुलिसिया मिलीभगत का तो नतीजा नहीं? ये ऐसे सवाल है जिसकी व्यापक जांच होने पर ही दूध का दूध और पानी का पानी हो पायेगा।

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