सुप्रीम कोर्ट ने कहा- पायजामे का नाड़ा खींचना और ब्रेस्ट पकड़ना लड़की के साथ रेप…हाईकोर्ट का आदेश पलटा

सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग से छेड़छाड़ के मामले में कहा कि पायजामे का नाड़ा तोड़ना और निजी अंग पकड़ना ‘रेप की कोशिश’ है। कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए इसे कानून की गलत व्याख्या बताया।

Post Published By: Mayank Tawer
Updated : 18 February 2026, 4:50 PM IST
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New Delhi: नाबालिग लड़की के साथ छेड़छाड़ के मामले में देश की सबसे बड़ी अदालत ने सख्त रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि किसी लड़की के पायजामे का नाड़ा तोड़ना, उसे जबरन खींचना और उसके निजी अंग पकड़ना केवल ‘तैयारी’ नहीं बल्कि रेप की कोशिश मानी जाएगी। कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें इसे रेप की तैयारी बताया गया था।

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट ने आपराधिक कानून के स्थापित सिद्धांतों का गलत इस्तेमाल किया। अदालत ने साफ कहा कि आरोपियों की हरकतें साफ तौर पर रेप की कोशिश की ओर इशारा करती हैं। पहली नजर में शिकायतकर्ता और अभियोजन पक्ष ने ‘अटेम्प्ट टू रेप’ का मामला बना दिया है।

इससे पहले 17 मार्च 2025 को हाईकोर्ट ने कहा था कि लड़की के निजी अंग पकड़ना, पायजामे की डोरी तोड़ना और पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश करना रेप या रेप की कोशिश नहीं है, बल्कि रेप की तैयारी है। इसके बाद ‘अटेम्प्ट टू रेप’ की धारा हटाने का आदेश दिया गया था।

क्या है पूरा मामला

कासगंज की एक महिला ने 12 जनवरी 2022 को कोर्ट में शिकायत दर्ज कराई थी। आरोप था कि 10 नवंबर 2021 को उसकी 14 साल की बेटी को गांव के दो युवकों ने बाइक पर बैठाकर घर छोड़ने के बहाने सुनसान जगह ले जाकर उसके साथ छेड़छाड़ की। लड़की के चीखने पर कुछ लोग मौके पर पहुंचे तो आरोपी तमंचा दिखाकर फरार हो गए। मामले में IPC की धारा 376, 354, 354B और POCSO एक्ट की धारा 18 के तहत केस दर्ज हुआ। लेकिन हाईकोर्ट ने इन धाराओं में बदलाव कर दिया था, जिससे विवाद बढ़ गया।

हाईकोर्ट के फैसले पर देशभर में विरोध हुआ। कानूनी विशेषज्ञों और राजनेताओं ने इसे असंवेदनशील बताया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए 25 मार्च 2025 को हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी।

तत्कालीन CJI B. R. Gavai और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने टिप्पणी की थी कि हाईकोर्ट की कुछ बातें पूरी तरह अमानवीय नजरिया दिखाती हैं। कोर्ट ने कहा कि ऐसी टिप्पणियां पीड़ितों पर ‘चिलिंग इफेक्ट’ डालती हैं और कई बार शिकायत वापस लेने का दबाव बनाती हैं।

अदालतों को दी नसीहत

8 दिसंबर 2025 की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जरूरत पड़ी तो सभी हाईकोर्ट के लिए गाइडलाइंस जारी की जा सकती हैं। अदालतों को फैसले लिखते समय बेहद सावधानी बरतनी चाहिए, खासकर तब जब मामला यौन अपराध से जुड़ा हो। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को महिला सुरक्षा और POCSO कानून की सख्त व्याख्या के तौर पर देखा जा रहा है। कानूनी जानकार मानते हैं कि यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों में मिसाल बनेगा।

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  • New Delhi

Published : 
  • 18 February 2026, 4:50 PM IST

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