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पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य पर तनाव बढ़ गया है और वैश्विक तेल बाजार में उथल-पुथल मच गई है। इसी बीच भारत ने कूटनीतिक पहल करते हुए ईरान से सीधे संवाद का रास्ता अपनाया है, जिससे भारतीय ध्वज वाले जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित की जा रही है।
भारत के विदेश मंत्री S. Jaishankar
New Delhi: पश्चिम एशिया का समुद्री इलाका इन दिनों किसी सस्पेंस थ्रिलर से कम नहीं लग रहा। तेल टैंकरों की आवाजाही, युद्धपोतों की हलचल और आसमान में मंडराते खतरे ने माहौल को बेहद तनावपूर्ण बना दिया है। पिछले 17 दिनों से जारी संघर्ष ने दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक, होर्मुज जलडमरूमध्य को वैश्विक संकट के केंद्र में ला खड़ा किया है। यही वह रास्ता है जहां से दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल की सप्लाई गुजरती है। ऐसे में यहां जरा-सी हलचल भी पूरी दुनिया के बाजारों को हिला देती है। इस तनावपूर्ण माहौल के बीच भारत ने चुपचाप लेकिन बेहद अहम कूटनीतिक चाल चली है। भारत ने ईरान से सीधे संवाद कर अपने जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने का रास्ता निकाल लिया है।
भारत के विदेश मंत्री S. Jaishankar ने हाल ही में एक इंटरव्यू में खुलासा किया कि भारत इस पूरे मामले में ईरान के साथ सीधे और स्पष्ट बातचीत कर रहा है। इस संवाद का मकसद सिर्फ एक है। भारतीय ध्वज वाले जहाजों को सुरक्षित तरीके से होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने देना। उन्होंने बताया कि ईरानी अधिकारियों के साथ बातचीत सकारात्मक रही है और इसके अच्छे नतीजे भी सामने आए हैं। भारत के कई जहाजों को पहले ही इस मार्ग से गुजरने की अनुमति मिल चुकी है और आने वाले समय में भी कई भारतीय जहाज इस रास्ते से गुजरेंगे।
विदेश मंत्री ने साफ किया कि इस मामले में भारत और ईरान के बीच कोई नया औपचारिक समझौता नहीं हुआ है। दरअसल हर भारतीय जहाज को अलग-अलग आधार पर अनुमति दी जा रही है। उन्होंने कहा कि यह पूरी तरह से संवाद और भरोसे पर आधारित प्रक्रिया है। भारत ने किसी तरह की डील या लेन-देन नहीं किया है, बल्कि पुराने संबंधों और भरोसे के आधार पर यह व्यवस्था बनाई गई है। उनका कहना था कि भारत और ईरान के बीच लंबे समय से सहयोग का रिश्ता रहा है और उसी रिश्ते की वजह से यह रास्ता निकला है।
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इस पूरे घटनाक्रम में उच्च स्तर पर भी संपर्क बना हुआ है। पिछले सप्ताह ईरान ने दो भारतीय झंडाधारी एलपीजी टैंकरों को होर्मुज से गुजरने की अनुमति दी थी। यह फैसला उस टेलीफोनिक बातचीत के कुछ ही घंटों बाद आया था जो भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन के बीच हुई थी। यह बातचीत अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध जैसे हालात बनने के बाद दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच पहला संपर्क था। इसके अलावा विदेश मंत्री जयशंकर और ईरान के अब्बास अर्घची के बीच भी इस मुद्दे पर चर्चा हुई।
हालांकि इस पूरे मामले में एक अहम बात यह भी सामने आई है कि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह बंद नहीं किया है। यह रास्ता फिलहाल अमेरिकी और इस्राइली जहाजों तथा उनके सहयोगियों के लिए बंद रखा गया है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव और ज्यादा बढ़ गया है। दुनिया के बड़े ऊर्जा आयातक देश इस स्थिति को लेकर चिंतित हैं क्योंकि अगर यह रास्ता पूरी तरह बंद होता है तो वैश्विक तेल सप्लाई पर बड़ा असर पड़ सकता है।
होर्मुज में बढ़ते तनाव का असर वैश्विक तेल बाजार पर साफ दिखने लगा है। पिछले कुछ दिनों में कच्चे तेल की कीमत तेजी से बढ़कर करीब 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि अगर पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है तो तेल की कीमतों में और उछाल देखने को मिल सकता है। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए यह स्थिति आर्थिक रूप से भी चुनौती बन सकती है।
इस संकट के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने अपने सहयोगी देशों से होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा के लिए युद्धपोत भेजने की अपील की थी। लेकिन कई देशों ने इस प्रस्ताव से दूरी बना ली। जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने साफ कर दिया कि वे इस संवेदनशील इलाके में अपने युद्धपोत नहीं भेजेंगे। ऐसे माहौल में भारत ने सैन्य ताकत दिखाने के बजाय कूटनीति का रास्ता चुना है।