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प्रतीकात्मक छवि (image source: internet)
New Delhi: ईरान-इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का असर अब सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था पर दिखाई देने लगा है। 28 फरवरी से शुरू हुए युद्ध और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने के बाद वैश्विक स्तर पर तेल और गैस सप्लाई प्रभावित हुई, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गईं। इसका असर भारत समेत दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाओं पर देखने को मिल रहा है।
देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हाल ही में 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ शुरुआत है और आने वाले समय में ईंधन की कीमतों में और बढ़ोतरी हो सकती है। एक्सिस बैंक के चीफ इकोनॉमिस्ट नीलकंठ मिश्रा के अनुसार तेल कंपनियों के घाटे को कम करने के लिए पेट्रोल-डीजल की कीमतों में करीब 15 रुपये प्रति लीटर तक की अतिरिक्त बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है।
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इंडियन ऑयल, बीपीसीएल और एचपीसीएल जैसी कंपनियां फिलहाल लागत से कम कीमत पर ईंधन बेच रही हैं, जिससे उन्हें रोजाना हजारों करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस आर्थिक दबाव का असर धीरे-धीरे आम लोगों तक पहुंचेगा।
तेल की बढ़ती कीमतों का असर अब महंगाई पर भी साफ दिखाई दे रहा है। अप्रैल में थोक महंगाई दर (WPI) बढ़कर 8.30 प्रतिशत तक पहुंच गई, जबकि खुदरा महंगाई दर (CPI) भी धीरे-धीरे ऊपर जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले महीनों में खाद्य पदार्थों, प्लास्टिक पैकेजिंग और रोजमर्रा के सामानों की कीमतों में तेजी आ सकती है।
इस बीच डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया भी लगातार कमजोर हो रहा है। फरवरी में 91 रुपये प्रति डॉलर के स्तर पर रहने वाला रुपया अब गिरकर 95.93 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया है। कमजोर रुपये की वजह से आयात महंगा हो रहा है, जिससे सरकार और कंपनियों दोनों पर अतिरिक्त दबाव बन रहा है।
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विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने भी शेयर बाजार को झटका दिया है। मार्च से अब तक विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से 23 अरब डॉलर से ज्यादा की पूंजी निकाल चुके हैं। इसके चलते सेंसेक्स में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है और निवेशकों की चिंता बढ़ गई है।
कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में तेज बढ़ोतरी ने कारोबारियों और छोटे उद्योगों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। मार्च 2026 में जो सिलेंडर 1884 रुपये का था, वह मई तक बढ़कर 3071 रुपये से ज्यादा पहुंच गया। वहीं वैश्विक एजेंसियों ने भी भारत की जीडीपी ग्रोथ को लेकर चेतावनी दी है। मूडीज और OECD जैसी संस्थाओं ने भारत की विकास दर के अनुमान घटा दिए हैं।
हालांकि आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था की बुनियाद अभी भी मजबूत है। अगर सरकार रुपये को स्थिर रखने, विदेशी निवेश बढ़ाने और ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा देने जैसे कदम उठाती है, तो देश इस संकट से उबर सकता है।
Location : New Delhi
Published : 16 May 2026, 11:35 PM IST