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असम चुनाव(Image Source: Google )
New Delhi: असम में चुनावी तैयारियां तेज होते ही राजनीतिक बयानबाजी भी तीखी होती जा रही है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के हालिया बयानों ने एक बार फिर राज्य में सांप्रदायिक और पहचान आधारित राजनीति को केंद्र में ला दिया है। असम की सामाजिक संरचना धार्मिक, जातीय और क्षेत्रीय विविधताओं से बनी है, जहां लंबे समय से स्वदेशी असमिया समुदायों और बंगाली मूल के मुसलमानों के बीच पहचान और नागरिकता को लेकर बहस होती रही है।
इस बार चुनावी माहौल में बंगाली मूल के मुसलमानों को लेकर आशंका और डर का नैरेटिव फिर से उभरा है, जिन्हें अपमानजनक तौर पर “मिया” कहे जाने का मुद्दा भी चर्चा में है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे बयान समाज के भीतर पहले से मौजूद विभाजनों को और गहरा कर सकते हैं। सवाल यह उठता है कि जब भाजपा का आधार मजबूत है और विपक्ष कमजोर, तब भी ध्रुवीकरण की राजनीति को हवा देने की जरूरत क्यों महसूस की जा रही है।
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मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के पास सरकार की उपलब्धियों की लंबी सूची है। उन्होंने खुद को आम जनता से सीधे जुड़ने वाले नेता के रूप में स्थापित किया है और “मामा” की छवि के जरिए भावनात्मक जुड़ाव बनाया है। नए साल की शुरुआत में पुरुष स्नातक और परास्नातक छात्रों के लिए ‘बाबू असोनी’ योजना की घोषणा की गई, जबकि ‘ओरुनोदोई’ योजना के तहत 37 लाख महिला लाभार्थियों को 8,000 रुपये की आर्थिक सहायता दी गई।
इसके अलावा, निजुत मोइना योजना (छात्राओं के लिए), मुख्यमंत्री महिला उद्यमिता अभियान (महिला कारोबारियों के लिए) और जीवन प्रेरणा योजना (स्नातकों के लिए) जैसी कई कल्याणकारी योजनाएं भाजपा को मजबूत जनाधार देती हैं। हालांकि विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची में विशेष संशोधन और 2023 के परिसीमन अभ्यास ने राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा दिया है। कांग्रेस समेत छह दलों ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी को ज्ञापन सौंपकर आरोप लगाया कि फर्जी आपत्तियों के जरिए वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश की जा रही है।
लगातार एक दशक से सत्ता से बाहर कांग्रेस अब भी संगठनात्मक संकट से जूझ रही है। प्रदेश अध्यक्ष के रूप में गौरव गोगोई की नियुक्ति से नेतृत्व का सवाल तो सुलझा है, लेकिन पार्टी के भीतर गुटबाजी खत्म नहीं हो पाई है। बीते वर्षों में कई वरिष्ठ नेताओं के पार्टी छोड़ने से कांग्रेस की जमीनी पकड़ कमजोर हुई है। पार्टी के भीतर यह धारणा है कि अगर छोटे समुदाय, अल्पसंख्यक वर्ग और अहोम समाज एकजुट होते हैं, तो समीकरण बदल सकते हैं, लेकिन फिलहाल ऐसा होता नहीं दिख रहा।
असम की राजनीति में क्षेत्रीय और छोटी पार्टियां भी अहम भूमिका निभाती हैं। बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट और पीपुल्स पार्टी लिबरल भाजपा गठबंधन में शामिल हैं, जबकि असम गण परिषद अधिक सीटों की मांग कर रही है। कांग्रेस गठबंधन में सीपीआई(एम), राइजर दल और असम जातीय परिषद शामिल हैं। वहीं, ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) का प्रभाव लोअर असम और बराक घाटी में बना हुआ है, जिसे कांग्रेस अल्पसंख्यक वोटों में बंटवारे का कारण मानती है।
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कुल मिलाकर असम का चुनावी मुकाबला विकास, कल्याणकारी योजनाओं और ध्रुवीकरण की राजनीति के बीच झूलता नजर आ रहा है। भाजपा को मुख्यमंत्री की लोकप्रियता का फायदा मिल सकता है, जबकि कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती खुद को एकजुट और विश्वसनीय विकल्प के रूप में पेश करने की है। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि असम की जनता किस राजनीति पर भरोसा जताती है।
Location : New Delhi
Published : 2 February 2026, 5:48 PM IST