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क्यों बुज़ुर्गों की पहली पसंद बनता था सफ़ेद रंग? (Img- AI)
New Delhi: पुराने ज़माने में जब भी हम अपने दादा-दादी या घर के बड़े-बुजुर्गों को देखते थे, तो उनके कपड़ों में एक बात सामान्य होती थी- सफेद रंग। ज्यादातर लोग इसे केवल उम्र के पड़ाव, सादगी या वैराग्य से जोड़कर देखते हैं। लेकिन सच यह है कि भारतीय संस्कृति और जीवनशैली में सफेद रंग का चुनाव केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरा वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक आधार छिपा हुआ है।
वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो सफेद रंग सूर्य की किरणों को अवशोषित करने के बजाय उन्हें रिफ्लेक्ट (परावर्तित) करता है। पुराने समय में जब एसी या पंखे जैसी आधुनिक सुविधाएं नहीं होती थीं, तब सफेद और ढीले-ढाले सूती (कॉटन) कपड़े शरीर को ठंडा रखने में मदद करते थे।
ढलती उम्र में शरीर की चयापचय (मेटाबॉलिज्म) दर धीमी हो जाती है और शरीर तापमान के प्रति संवेदनशील हो जाता है। ऐसे में सफेद कपड़े त्वचा को सांस लेने का अवसर देते हैं और शरीर को गर्मी से बचाते हैं।
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मनोविज्ञान के अनुसार, रंगों का हमारे मन और मस्तिष्क पर सीधा प्रभाव पड़ता है। सफेद रंग शांति, पवित्रता, और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। जीवन के अंतिम पड़ाव में व्यक्ति अक्सर भागदौड़, तनाव और सांसारिक मोह-माया से दूर होकर मानसिक शांति की ओर बढ़ता है। सफेद रंग मन को शांत रखने, विचारों में स्थिरता लाने और तनाव को कम करने में मदद करता है।
भारतीय दर्शन में तीन गुण बताए गए हैं सत, रज और तम। सफेद रंग को 'सात्विक' प्रवृत्ति का प्रतीक माना जाता है। बुजुर्गवस्था को जीवन का वह चरण माना गया है जहां व्यक्ति भौतिक सुखों से ऊपर उठकर सात्विकता की ओर अग्रसर होता है। चमकीले और भड़कीले रंग 'राजसिक' या 'तामसिक' प्रवृत्तियों को बढ़ावा देते हैं, जबकि सफेद रंग चित्त को शुद्ध और ध्यान केंद्रित करने में सहायक होता है।
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इसके अलावा, एक व्यावहारिक कारण यह भी था कि पुराने समय में सूती सफेद कपड़ों को धोना और धूप में सुखाकर कीटाणुरहित करना बहुत आसान होता था। सफेद रंग पर गंदगी तुरंत दिखाई दे जाती थी, जिससे स्वच्छता का ध्यान रखना आसान हो जाता था। इस प्रकार, बुजुर्गों द्वारा सफेद रंग चुनना उनकी समझदारी, स्वास्थ्य जागरूकता और आध्यात्मिक गहराई को दर्शाता है।
Location : New Delhi
Published : 8 September 2026, 2:42 PM IST