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पूर्वांचल की कजरी (Img: X)
Varanasi: पूर्वांचल में सावन की बारिश और कजरी के बीच सदियों पुराना रिश्ता है। यहां कजरी सिर्फ एक लोकगीत नहीं, बल्कि भावनाओं, परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। महिलाओं की विरह-वेदना से लेकर किसानों की मेहनत और पहलवानों के जोश तक, कजरी हर वर्ग के लोगों के जीवन में रची-बसी है।
आज भी पूर्वांचल में पुरुष और महिलाएं समूह में इकट्ठा होकर कजरी गाते और उस पर नाचते हैं। अपनी मधुर धुन और दिल को छू लेने वाले बोलों की वजह से, कजरी अब इंटरनेट पर भी बहुत लोकप्रिय हो रही है।
कजरी 80 से ज्यादा अलग-अलग शैलियों में गाई जाती है। इनमें बनारसी, मिर्जापुरी, चौलर, डुनमुनियां, झूला और उठान कजरी प्रमुख हैं। वाराणसी और उसके आस-पास के लगभग दस जिलों में कजरी गायन की मजबूत परंपरा रही है। सावन के मौसम में, ये गीत अपनों से दूर महिलाओं की तड़प को आवाज देते हैं; साथ ही, धान की रोपाई कर रहे किसानों के लिए ऊर्जा का स्रोत और दंगल (कुश्ती के अखाड़े) में उतरने वाले पहलवानों के लिए वीरता का प्रतीक भी बनते हैं।
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कजरी गायन की परंपरा को आगे बढ़ाने में मिर्जापुर के कलाकारों ने अहम भूमिका निभाई है। इस लोक कला को नई पहचान दिलाने में उनके योगदान के लिए मिर्जापुर की अजिता श्रीवास्तव (2022) और उर्मिला श्रीवास्तव (2024) को प्रतिष्ठित पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। हालांकि बदलते समय के साथ कजरी गायन का स्वरूप बदला है, फिर भी लोगों के दिलों में इसकी खास जगह बनी हुई है।
कजरी की हर शैली की अपनी एक अलग पहचान है:
कजरी कलाकारों का कहना है कि पहले यह परंपरा गांवों और स्थानीय कार्यक्रमों तक ही सीमित थी, लेकिन इंटरनेट और सोशल मीडिया की वजह से अब इसकी पहुंच काफी बढ़ गई है। कजरी कलाकार लालबहादुर यादव बताते हैं कि जौनपुर में मुख्य रूप से कजरी की चौलर, डुन्मुनिया और उठान शैलियां गाई जाती हैं। सावन के महीने में अब कलाकारों को बड़े शहरों में भी कार्यक्रम करने के लिए बुलाया जा रहा है।
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पद्म श्री उर्मिला श्रीवास्तव का कहना है कि कजरी अब किसी खास जिले या राज्य तक सीमित नहीं है; इसने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी एक अलग पहचान बनाई है। लोगों की बढ़ती भागीदारी इस लोक कला को नई जान दे रही है। वहीं, अनुभवी कलाकारों का मानना है कि डिजिटल युग ने लोगों को करीब तो किया है, लेकिन पारंपरिक रिश्तों और भावनात्मक जुड़ाव के मामले में दूरी भी पैदा की है। ऐसे में, कजरी जैसी लोक परंपराओं को बचाकर रखना बहुत ज़रूरी है ताकि आने वाली पीढ़ियाँ अपनी संस्कृति से जुड़ी रह सकें।
Location : Varanasi
Published : 23 August 2026, 7:56 PM IST