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उत्तर प्रदेश लोक निर्माण विभाग (PWD) के लखनऊ प्रांतीय खंड में टेंडरों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि यहां 70 प्रतिशत से भी कम दरों पर टेंडर जारी किए जा रहे हैं और बाद में इंजीनियरों व ठेकेदारों की मिलीभगत से नए काम जोड़कर बढ़े हुए रेट पर भुगतान कर दिया जाता है।
लोक निर्माण विभाग
Lucknow: उत्तर प्रदेश लोक निर्माण विभाग प्रदेश में सड़क निर्माण और रखरखाव का एक अहम विभाग माना जाता है। लेकिन समय-समय पर विभाग की कार्यशैली को लेकर सवाल उठते रहे हैं। ताजा मामला राजधानी लखनऊ के प्रांतीय खंड से जुड़ा है, जहां टेंडर प्रक्रिया को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं।
सूत्रों के अनुसार, यहां कई टेंडर ऐसे रेट पर जारी किए जा रहे हैं, जो अनुमानित लागत से 70 प्रतिशत से भी कम हैं। आम तौर पर इतनी कम दरों पर सड़क निर्माण जैसे कार्यों को गुणवत्तापूर्ण ढंग से पूरा करना मुश्किल माना जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इतनी कम बोली लगाने वाली फर्में काम कैसे कर रही हैं और उन्हें इसका लाभ कैसे मिल रहा है।
सूत्रों का दावा है कि टेंडर जारी होने के बाद कुछ इंजीनियरों और ठेकेदारों की मिलीभगत से कार्य में बदलाव किए जाते हैं। आरोप है कि पहले कम रेट पर टेंडर पास कराया जाता है और काम शुरू होने के बाद उसमें अतिरिक्त या नए कार्य जोड़ दिए जाते हैं।
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इन अतिरिक्त कार्यों के नाम पर बाद में उसी फर्म को बढ़े हुए रेट से भुगतान कर दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में सरकारी नियमों की अनदेखी और पारदर्शिता की कमी की बात कही जा रही है। अगर ये आरोप सही हैं, तो यह न केवल वित्तीय अनियमितता का मामला है, बल्कि इससे विभाग की छवि भी धूमिल होती है। प्रदेश के अन्य जिलों में भी पहले ठेका और टेंडर मैनेज होने के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन राजधानी लखनऊ में इस तरह के आरोप सामने आना विभाग के लिए ज्यादा गंभीर माना जा रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन आरोपों पर विभाग और शासन की ओर से क्या कदम उठाए जाएंगे, क्या पूरे मामले की जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदारों पर कार्रवाई होगी, या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा। जानकारों का कहना है कि यदि समय रहते इस तरह की शिकायतों की निष्पक्ष जांच नहीं की गई, तो इससे न केवल सरकारी धन का दुरुपयोग होगा, बल्कि सड़क निर्माण की गुणवत्ता भी प्रभावित होगी। आम जनता को खराब सड़कों और अधूरे कार्यों का खामियाजा भुगतना पड़ता है।
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फिलहाल, लखनऊ प्रांतीय खंड में टेंडरों को लेकर उठे ये सवाल विभाग के लिए एक बड़ी चुनौती बन गए हैं। अब देखना यह है कि सरकार पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए क्या ठोस कदम उठाती है, या फिर ठेकेदारों और फर्मों को उपकृत करने का यह खेल आगे भी बदस्तूर जारी रहेगा।