हिंदी
अब घरों की जूठन और सीवेज स्लज से बनेगी बायोगैस और मीथेन (Img: Pinterest)
New Delhi: रोजाना घरों के कचरे में फेंका जाने वाला बचा हुआ खाना भविष्य में खाना पकाने वाली गैस और बिजली का स्रोत बन सकता है। हारकोर्ट बटलर टेक्निकल यूनिवर्सिटी (HBTU) के बायोकेमिकल इंजीनियरिंग विभाग ने घरों से निकलने वाले खाने के कचरे और सीवेज स्लज से बायोगैस और मीथेन बनाने पर अहम रिसर्च की है। इस टेक्नोलॉजी को अपार्टमेंट, होटल, हॉस्टल, कैंटीन, गांवों और रिहायशी सोसायटियों में स्थानीय स्तर पर लागू किया जा सकता है।
विभाग के प्रमुख डॉक्टर की देखरेख में हुई एक स्टडी में रिसर्चर्स ने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के स्लज को घरों और हॉस्टल की मेस से बचे हुए पके खाने के साथ मिलाकर बायोमीथेन बनाने का टेस्ट किया। रिसर्च के लिए 20 प्रतिशत सीवेज स्लज और 80 प्रतिशत खाने के कचरे का मिश्रण तैयार किया गया। नतीजों से पता चला कि अकेले सीवेज स्लज के इस्तेमाल की तुलना में मीथेन के उत्पादन में लगभग 240 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। इस प्रक्रिया से लगभग 169 mL/g VS (वोलाटाइल सॉलिड्स) मीथेन मिली।
यह भी पढ़ें - सिर्फ टेक्नोलॉजी और AI से नहीं होगा विकास, रोजगार और स्वरोजगार भी जरूरी: देवरिया सांसद शशांक मणि के दो टूक
प्रक्रिया को और बेहतर बनाने के लिए रिसर्चर्स ने बायोचार-आधारित एडिटिव का इस्तेमाल किया। इसके इस्तेमाल से मीथेन का उत्पादन बढ़कर लगभग 294 mL/g VS हो गया। स्टडी के दौरान चावल, सब्जियां, ब्रेड और अन्य पके हुए खाने की चीजों को अलग-अलग अनुपात में सीवेज स्लज के साथ मिलाकर भी टेस्ट किए गए। रिसर्चर्स के अनुसार, स्लज के साथ खाने का कचरा मिलाने से स्लज की कम बायोडिग्रेडेबिलिटी (आसानी से न सड़ने की क्षमता) की समस्या को दूर करने में मदद मिली।
HBTU में की गई रिसर्च सिर्फ घरों से निकलने वाले खाने के कचरे तक ही सीमित नहीं थी। स्टडी के दूसरे चरण में बायोगैस उत्पादन के लिए गेहूं के भूसे और पराली के साथ-साथ समुद्री शैवाल की प्रोसेसिंग से निकलने वाले कचरे का भी इस्तेमाल किया गया। एनारोबिक डाइजेशन प्रक्रिया का इस्तेमाल करके इन सामग्रियों को अलग-अलग और अलग-अलग अनुपात में मिलाकर गैस उत्पादन की क्षमता का आकलन किया गया। प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए 100°C पर थर्मल प्री-ट्रीटमेंट भी किया गया।
डॉक्टर के अनुसार, इस प्रक्रिया में लगभग 80% खाने के कचरे और 20% सीवेज स्लज (गंदे पानी के कचरे) के मिश्रण को ड्रम के आकार के डाइजेस्टर में डाला जाता है। स्लज में मौजूद सूक्ष्मजीव कार्बनिक पदार्थों को तोड़ते हैं, जिससे मीथेन गैस बनती है। इस मीथेन का इस्तेमाल खाना पकाने के लिए किया जा सकता है, जबकि बड़े पैमाने पर चलने वाले प्लांट में इस गैस से बिजली भी बनाई जा सकती है।
यह भी पढ़ें - सिर्फ टेक्नोलॉजी और AI से नहीं होगा विकास, रोजगार और स्वरोजगार भी जरूरी: देवरिया सांसद शशांक मणि के दो टूक
इस तकनीक का मुख्य फायदा यह है कि यह एक साथ दो समस्याओं को हल कर सकती है: कार्बनिक कचरे का निपटान और ऊर्जा की जरूरतें। घरों और संस्थानों से निकलने वाले खाने के कचरे को बस फेंकने के बजाय इसका इस्तेमाल स्थानीय स्तर पर ऊर्जा बनाने के लिए किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में जिस खाने के कचरे को हम अभी फेंक देते हैं, सही तकनीक का इस्तेमाल करके उसे गैस और बिजली के स्रोत में बदला जा सकता है।
Location : New Delhi
Published : 4 October 2026, 2:51 PM IST
Topics : HBTU Kanpur News UP News