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टाटा ग्रुप विवाद (सोर्स- Pinterest)
New Delhi: देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित कॉर्पोरेट घराने टाटा ग्रुप में एक बार फिर आंतरिक कलह खुलकर सामने आ गई है। टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच छिड़ा यह नया विवाद अब देश की अदालतों और कानूनी गलियारों तक पहुंच चुका है। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इस हाई-प्रोफाइल कानूनी लड़ाई में देश के दो सबसे दिग्गज वकील हरीश साल्वे और अभिषेक मनु सिंघवी एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े हो गए हैं। यह वही जोड़ी है जिसने साल 2021 के चर्चित टाटा-मिस्त्री मामले में सुप्रीम कोर्ट में कंधे से कंधा मिलाकर टाटा संस का पक्ष रखा था, लेकिन इस बार हालात बिल्कुल उलट हैं और दोनों अलग-अलग खेमों की ढाल बने हैं।
विवाद के इस नए दौर में दोनों पक्षों ने अपनी कानूनी स्थिति को मजबूत करने के लिए देश के शीर्ष वकीलों को मैदान में उतारा है। नोएल टाटा की अगुवाई वाले टाटा ट्रस्ट्स (Tata Trusts) की कमान वरिष्ठ वकील और कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने संभाली है। वे टाटा संस के बोर्ड द्वारा हाल ही में लिए गए फैसलों को कानूनी चुनौती दे रहे हैं। दूसरी ओर, एन. चंद्रशेखरन और टाटा संस (Tata Sons) के बोर्ड का मजबूत पक्ष रखने के लिए देश के पूर्व सॉलिसिटर जनरल और वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे मोर्चा संभाले हुए हैं।
इस पूरे घमासान की मुख्य वजह टाटा संस के चेयरमैन पद पर एन. चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति और कंपनी की पब्लिक लिस्टिंग को लेकर है। बीते 17 सितंबर 2026 को हुई टाटा संस की बोर्ड बैठक में बहुमत के आधार पर चंद्रशेखरन को अगले पांच वर्षों के लिए फिर से चेयरमैन नियुक्त करने का प्रस्ताव पास किया गया था। इस फैसले का नोएल टाटा ने कड़ा विरोध किया। इसके अलावा, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के कड़े नियमों के चलते टाटा संस को शेयर बाजार में सूचीबद्ध (Public Company) करने की अनिवार्यता पर भी दोनों पक्षों के बीच गहरी तकरार चल रही है।
दोनों वकीलों ने मीडिया साक्षात्कारों और सार्वजनिक मंचों पर एक-दूसरे के खिलाफ तीखी और मजबूत दलीलें पेश की हैं। टाटा ट्रस्ट्स का पक्ष रखते हुए अभिषेक मनु सिंघवी का तर्क है कि कंपनी में 66 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले मुख्य शेयरधारक यानी टाटा ट्रस्ट्स की असहमति के बावजूद बोर्ड कोई भी मनमाना फैसला नहीं ले सकता। उनके मुताबिक, नियम 121 के तहत चेयरमैन की नियुक्ति के लिए ट्रस्ट द्वारा नामित निदेशकों के बहुमत की सहमति होना अनिवार्य है। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट भी अपने पुराने फैसलों में ट्रस्ट की सर्वोच्चता को मान्यता दे चुका है।
इसके विपरीत, हरीश साल्वे ने टाटा संस के बोर्ड का बचाव करते हुए कहा है कि आरबीआई के नियमों का पालन करते हुए कंपनी को सार्वजनिक कंपनी में बदलना वक्त की जरूरत है। उन्होंने सवाल उठाया कि 270 अरब डॉलर से अधिक के इस विशाल कॉर्पोरेट साम्राज्य को कुछ चुनिंदा ट्रस्टी बंद कमरों से नियंत्रित नहीं कर सकते, इसके लिए पेशेवर पारदर्शिता जरूरी है। साल्वे का साफ मानना है कि किसी भी बड़ी कंपनी को गतिरोध (Deadlock) की स्थिति में नहीं चलाया जा सकता और लिस्टिंग का विरोध कॉर्पोरेट गवर्नेंस के नाम पर निजी हितों के तहत किया जा रहा है।
इस पूरे प्रकरण पर अभिषेक मनु सिंघवी ने अपनी निजी भावनाएं साझा करते हुए खेद जताया है। उन्होंने कहा कि वे उद्योगपति दिवंगत रतन टाटा के बेहद करीब रहे हैं और उनकी हमेशा यह इच्छा थी कि यह विवाद आपसी बातचीत से सुलझ जाए। हालांकि, अब जब सारे रास्ते बंद हो चुके हैं, तो इस महासंग्राम का फैसला अदालत के कानूनी दांव-पेचों से ही तय होगा। कुल मिलाकर, टाटा साम्राज्य के भीतर का यह घमासान आने वाले दिनों में भारतीय कॉर्पोरेट इतिहास के सबसे बड़े कानूनी अध्यायों में से एक बनने जा रहा है।
Location : New Delhi
Published : 21 September 2026, 8:30 AM IST