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राशन कालाबाजारी खेल का पर्दाफाश (Img: Dynamite News)
Siddharthnagar: प्रदेश सरकार के ‘जीरो टॉलरेंस’ और पारदर्शी व्यवस्था के तमाम रटे-रटाए दावे एक बार फिर जमीनी हकीकत के सामने दम तोड़ते नजर आ रहे हैं। मामला सिद्धार्थनगर जिले के उसका बाजार का है, जहां गरीबों के पेट तक पहुंचने वाला राशन खुलेआम कालाबाजारी और लूट की भेंट चढ़ रहा है। जिला प्रशासन की लीपापोती और सुस्त कार्यशैली के बीच, परिवहन ठेकेदार फर्म 'मैसर्स पीसी ट्रांसपोर्ट' के नुमाइंदों ने प्रशासनिक संरक्षण के दम पर ऐसा दुस्साहस दिखाया कि राशन माफियाओं के हौसले बुलंद नजर आ रहे हैं।
खाद्यान्न वितरण व्यवस्था में खुलेआम चल रहे इस संगठित भ्रष्टाचार ने सरकार की प्रशासनिक पकड़ और निगरानी तंत्र की पोल खोलकर रख दी है।
जिला पूर्ति विभाग की जांच में जो तथ्य सामने आए हैं, वे किसी भूचाल से कम नहीं हैं। अगस्त 2026 के आवंटन के तहत गरीबों में बंटने वाला 256.50 कुंतल गेहूं और 208.50 कुंतल चावल सरकारी गोदामों से तो निकला, लेकिन कोटे की दुकानों तक पहुंचने के बजाय सीधे बिचौलियों और कालाबाजारियों के ठिकानों पर डकार लिया गया।
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इस गंभीर गबन और कालाबाजारी के खुलासे के बाद, जिलाधिकारी के निर्देश पर थाना उसका बाजार में आरोपी परिवहन ठेकेदार फर्म के प्रोपराइटर प्रेमचन्द जायसवाल और उसके प्रतिनिधि रोहित यादव के खिलाफ आवश्यक वस्तु अधिनियम (Essential Commodities Act) की धारा 3/7 के तहत मुकदमा संख्या 0114 दर्ज किया गया है।
यह सवाल अब हर आम नागरिक की जुबान पर है कि आखिर कैसे एक ट्रांसपोर्टर और उसके नुमाइंदे इतनी बड़ी मात्रा में सरकारी खाद्यान्न को खुर्द-बुर्द करने का दुस्साहस कर रहे थे?
सूत्रों के हवाले से यह बात भी सामने आ रही है कि यह कोई पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले मई और जुलाई 2026 के खाद्यान्न वितरण के दौरान भी इसी फर्म द्वारा बड़े पैमाने पर अनियमितताएं बरती गईं थीं। सवाल यह उठता है कि जब पूर्व के महीनों में भी गड़बड़ियों की सुगबुगाहट थी, तो स्थानीय प्रशासन और पूर्ति विभाग ने तब सख्त कार्रवाई क्यों नहीं की? क्या जिला प्रशासन किसी बड़े राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव के तहत आंखें मूरे बैठा था? क्या स्थानीय स्तर के अधिकारियों की मौन सहमति के बिना खुलेआम ट्रकों के ट्रक खाद्यान्न गायब हो जाना संभव है?
एक तरफ सूबे की सरकार गरीबों के कल्याण, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार मुक्त शासन के बड़े-बड़े विज्ञापनों और भाषणों से अपनी पीठ थपथपाती नहीं थकती, वहीं दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर सिस्टम इस कदर सड़ चुका है कि गरीबों का हक सीधे माफियाओं की तिजोरी में जा रहा है।
यदि स्थानीय प्रशासन समय रहते और शुरुआती शिकायतों (मई-जुलाई) पर ही गंभीर हो जाता, तो शायद अगस्त में इतने बड़े पैमाने पर खाद्यान्न का गबन न होता। महकमे की यह सुस्ती और लीपापोती सीधे तौर पर भ्रष्टाचारियों को परोक्ष संरक्षण देने जैसी है।
अब देखना यह होगा कि क्या इस मुकदमे के बाद सिर्फ खानापूर्ति कर के मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा, या फिर इस पूरे सिंडिकेट के पीछे छिपे उन तमाम प्रशासनिक और सियासी चेहरों को भी बेनकाब किया जाएगा, जिनकी छत्रछाया में गरीबों के निवाले की यह खुली लूट फल-फूल रही है? जनता और पीड़ित तबका अब महज कागजी FIR से संतुष्ट होने वाला नहीं, उसे इस व्यवस्थागत भ्रष्टाचार के हर एक जिम्मेदार पर कड़ी और नजीर पेश करने वाली कार्रवाई चाहिए।
Location : Siddharthnagar
Published : 6 August 2026, 7:04 PM IST