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हिमालयी क्षेत्र बर्फ विहीन हो चुके हैं, दिसंबर-जनवरी में भी नदियाँ सूखने लगी हैं और जंगल आग की भेंट चढ़ रहे हैं। कृषक, पर्यावरणविद और आम लोग चिंतित हैं। ये संकेत पर्यावरणीय असंतुलन और जलवायु परिवर्तन की गंभीर चेतावनी दे रहे हैं।
हिमालय बर्फ विहीन
Rudraprayag: उच्च हिमालयी क्षेत्रों में इन दिनों स्थिति चिंताजनक है। जहां कभी दिसंबर और जनवरी के महीनों में पर्वत बर्फ की चादरों से ढके रहते थे, वहां आज बर्फ बिलकुल नहीं है। यह बदलाव न केवल प्राकृतिक दृश्य को प्रभावित कर रहा है, बल्कि जीवनदायिनी नदियों के जल स्रोत भी सूखने लगे हैं। मंदाकिनी और अलकनंदा जैसी प्रमुख नदियां अपने जल स्तर में लगातार गिरावट दिखा रही हैं। केदारपुरी और आसपास के क्षेत्र भी अब बर्फबिहीन हो चुके हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल प्राकृतिक बदलाव नहीं है। लगातार बढ़ते मानवजनित हस्तक्षेप, ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना, और जलवायु परिवर्तन इस संकट के प्रमुख कारण हैं। सूखते झरने और नदी नाले, जंगलों में आग लगना, और बर्फ की कमी स्पष्ट संकेत हैं कि पर्यावरण असंतुलन गहराता जा रहा है।
कृषक और आम लोग इन बदलावों को सीधे महसूस कर रहे हैं। जहां पहले बर्फ और ओस के कारण पहाड़ों की मिट्टी गीली रहती थी और जल स्रोत निरंतर पानी का डिस्चार्ज करते थे, आज वही क्षेत्र सूखने लगे हैं। पानी की कमी और जंगलों की आग ने स्थानीय जीवन को प्रभावित करना शुरू कर दिया है।
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मंदाकिनी और अलकनंदा जैसी नदियां हिमालय की जीवनरेखा मानी जाती हैं। लेकिन वर्तमान में इनके जल स्तर में लगातार गिरावट देखी जा रही है। यह केवल कृषि के लिए खतरा नहीं है, बल्कि स्थानीय निवासियों के जल आपूर्ति, मछली पालन और पर्यावरणीय संतुलन के लिए भी बड़ा संकट है।
जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ रही हैं। विशेषज्ञ इसे जलवायु परिवर्तन से जोड़ते हैं। इसके साथ ही पहाड़ों में असामान्य रूप से कड़ाके की ठंड पड़ रही है। ऐसा लग रहा है मानो बर्फबारी हो रही हो, लेकिन वास्तविकता में तापमान रात में 1 डिग्री तक गिर रहा है। यह संकेत भी अच्छे नहीं हैं और भविष्य में प्राकृतिक आपदाओं की आशंका जताते हैं।
जलते जंगल
कृषक और पर्यावरणविद दोनों ही चिंतित हैं। बर्फ विहीन हिमालय, सूखते जल स्रोत और आग की घटनाएं यह स्पष्ट कर रही हैं कि जलवायु परिवर्तन केवल दूर की भविष्यवाणी नहीं, बल्कि वर्तमान संकट बन चुका है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन संकेतों को नजरअंदाज करना मानवता के लिए गंभीर खतरे की घंटी है।
विशेषज्ञों के अनुसार, अगर यह रुझान जारी रहा, तो आने वाले समय में जल संकट, कृषि समस्याएँ, भू-स्खलन और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएं और बढ़ सकती हैं। यह न केवल हिमालयी क्षेत्र के लिए, बल्कि पूरे भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
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पर्यावरणविद और वैज्ञानिक सुझाव दे रहे हैं कि ग्लेशियर संरक्षण, जल स्रोतों का संवर्धन, जंगलों की सुरक्षा और मानवीय गतिविधियों को नियंत्रित करना अनिवार्य है। साथ ही स्थानीय स्तर पर लोगों को जागरूक करना और सरकारी नीतियों के तहत उपाय करना जरूरी है।
हिमालय की यह प्राकृतिक चेतावनी संकेत दे रही है कि पर्यावरणीय असंतुलन केवल हिमालय तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव पूरे देश के जलवायु और जीवन पर पड़ सकता है।