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सीतापुर में धान खरीद की बदहाली (Img: Dynamite News)
Sitapur: उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में किसान खेत में धान उगाए, पसीना बहाकर फसल तैयार करे और जब उसे बेचने की बारी आए तो सरकारी रिकॉर्ड में उसी जमीन पर गन्ना दर्ज मिले। सीतापुर में सरकारी व्यवस्था की यही तस्वीर किसानों की परेशानी बढ़ा रही है। फसल सर्वे में कथित लापरवाही का खामियाजा किसानों को अपनी उपज औने-पौने दाम पर बेचकर भुगतना पड़ रहा है। सरकारी क्रय केंद्रों पर धान बेचने के लिए पंजीकरण नहीं हो पा रहा है। मजबूर किसान निजी व्यापारियों को 1500 से 1600 रुपये प्रति क्विंटल धान बेच रहे हैं, जबकि सरकारी समर्थन मूल्य 2460 रुपये है। यानी सरकारी रिकॉर्ड की एक गलती किसान को प्रति क्विंटल 860 से 960 रुपये तक की चोट पहुंचा रही है।
विडंबना यह है कि जिले में धान खरीद के लिए 135 क्रय केंद्र स्थापित करने का दावा किया गया है, लेकिन अब तक महज 42 केंद्रों पर ही खरीद हो सकी है। 12 अक्टूबर से खरीद शुरू होने के सरकारी दावे और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है।
प्रदेश में भारी बारिश और तेज हवाओं से फसलों को नुकसान पहुंचने के बाद शासन ने प्रभावित किसानों का सर्वे कराने के निर्देश दिए थे। आरोप है कि सर्वे के दौरान खेतों की वास्तविक स्थिति की जांच किए बिना ही फसल का विवरण दर्ज कर दिया गया। जहां खेतों में धान खड़ा था, वहां सरकारी अभिलेखों में गन्ना दर्ज कर दिया गया। कुछ स्थानों पर इसके उलट भी गड़बड़ी की शिकायतें हैं।
नई फार्मर रजिस्ट्री व्यवस्था में भूमि और फसल का विवरण ऑनलाइन दर्ज रहता है। सर्वे में हुई कथित गड़बड़ी का असर अब सरकारी खरीद के पंजीकरण पर पड़ रहा है। किसान जब धान बेचने के लिए आवेदन करते हैं तो पोर्टल पर उनकी जमीन में गन्ने की फसल दिखाई देती है। नतीजतन पंजीकरण की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती।
किसानों के सामने दोहरी मार है। एक ओर खेत में तैयार धान बेचने की चिंता है, दूसरी ओर रिकॉर्ड दुरुस्त कराने के लिए तहसील और विभागों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। सवाल यह है कि बिना सत्यापन फसल का विवरण बदलने वाले जिम्मेदारों पर कार्रवाई कब होगी?
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धान खरीद के लिए जिले में पीसीएफ के 45, पीसीओ के 37, यूपीएसएस के पांच, मंडी समिति के चार और खाद्य विभाग के 41 केंद्रों सहित कुल 135 क्रय केंद्र बनाए गए हैं। इन केंद्रों पर 2284 किसानों का पंजीकरण हुआ है। कागजों में 12 अक्टूबर से खरीद भी शुरू हो चुकी है, लेकिन अब तक केवल 42 केंद्रों पर ही धान खरीदा जा सका है।
इस बार जिले को 1.63 लाख मीट्रिक टन धान खरीद का लक्ष्य दिया गया है। इसके मुकाबले 35 दिनों में महज 1500 मीट्रिक टन खरीद होने की जानकारी सामने आई है। यह आंकड़ा खरीद व्यवस्था की सुस्ती को साफ उजागर करता है। सरकारी कर्मचारियों की हड़ताल भी हाल ही में समाप्त हो चुकी है, फिर भी खरीद केंद्रों पर अपेक्षित तेजी नहीं दिखाई दे रही है।
जब जिले में 135 केंद्र बनाए गए और 2284 किसान पंजीकृत हैं तो खरीद की रफ्तार इतनी धीमी क्यों है? क्या केंद्र केवल कागजों पर सक्रिय हैं या खरीद एजेंसियों ने अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाई? इन सवालों का जवाब संबंधित विभागों को देना होगा।
किसानों को हुआ नुकसान (Img: Dynamite News)
सरकारी समर्थन मूल्य 2460 रुपये प्रति क्विंटल है, लेकिन पंजीकरण की समस्या से जूझ रहे किसान निजी व्यापारियों को 1500 से 1600 रुपये में धान बेचने को मजबूर हैं। प्रति क्विंटल 860 से 960 रुपये का अंतर है। दस क्विंटल धान पर किसान को 8600 से 9600 रुपये तक कम कीमत मिल रही है। सीतापुर गल्ला मंडी में 15 प्रतिशत नमी वाले धान का भाव करीब 1900 रुपये प्रति क्विंटल बताया जा रहा है।
सरकारी खरीद व्यवस्था का उद्देश्य किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाना है, लेकिन यहां व्यवस्था की खामियां ही किसान के नुकसान की वजह बन रही हैं। पंजीकरण नहीं तो सरकारी खरीद नहीं और खरीद नहीं तो किसान निजी बाजार के भरोसे। ऐसे में सवाल है कि समर्थन मूल्य का लाभ आखिर किसके लिए है?
करीब एक सप्ताह पहले इस मामले में उप खाद्य एवं विपणन अधिकारी सुभाष चंद्र से बातचीत की गई थी। उन्होंने समस्या को गंभीर बताते हुए जांच कमेटी गठित किए जाने और जल्द निस्तारण का भरोसा दिया था। लेकिन सप्ताहभर बीतने के बाद भी किसानों की समस्या जस की तस बनी हुई है।
कमेटी में कौन अधिकारी शामिल हैं? जांच कब शुरू हुई? कितने किसानों के रिकॉर्ड में गड़बड़ी मिली? कितने मामलों का निस्तारण हुआ? इन सवालों पर अब तक कोई ठोस जानकारी सामने नहीं आई है। यदि कमेटी गठित हो चुकी है तो उसकी कार्रवाई का परिणाम किसानों तक क्यों नहीं पहुंचा? किसानों को जांच के नाम पर इंतजार कराना आखिर कब तक जारी रहेगा?
खाद, बिजली और अन्य समस्याओं पर आंदोलन करने वाले किसान संगठनों की सक्रियता भी इस मामले में नजर नहीं आ रही है। जब किसान अपनी तैयार फसल का उचित मूल्य पाने के लिए संघर्ष कर रहा है, तब उसकी आवाज उठाने वाले संगठन कहां हैं? निजी खरीद में कम कीमत मिलने और सरकारी खरीद की धीमी रफ्तार के बीच किसानों को प्रभावी समर्थन की जरूरत है।
पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर यह पता लगाना जरूरी है कि सर्वे में किस स्तर पर लापरवाही हुई और किसानों को हुए नुकसान की जिम्मेदारी किसकी है। किसी भी तरह की मिलीभगत के आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है।
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मामले पर जिलाधिकारी डॉ. राजा गणपति आर. से बातचीत की गई तो उन्होंने बताया कि प्रकरण अभी तक उनके संज्ञान में नहीं था। उन्होंने एक-दो दिन में व्यवस्था दुरुस्त कराने का आश्वासन दिया है। अब देखना यह है कि प्रशासन का यह भरोसा कितनी जल्दी जमीन पर उतरता है।
प्रशासन के सामने तीन बड़ी चुनौतियां हैं- गलत फसल विवरण तत्काल दुरुस्त कराना, प्रभावित किसानों का पंजीकरण सुनिश्चित करना और सभी क्रय केंद्रों पर खरीद में तेजी लाना। साथ ही सर्वे में लापरवाही करने वालों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
किसान को कमेटी के गठन और अधिकारियों के आश्वासन से राहत नहीं मिलने वाली। उसे अपनी फसल का उचित मूल्य चाहिए। सरकारी रिकॉर्ड में गन्ना दर्ज होने से खेत में खड़ा धान गन्ना नहीं बन जाता, लेकिन व्यवस्था की इस गलती ने किसान की मेहनत की कीमत जरूर घटा दी है। अब प्रशासन को तय करना है कि वह किसानों को राहत देगा या सरकारी खरीद के आंकड़ों और आश्वासनों से ही व्यवस्था की सफलता साबित करता रहेगा।
Report By- हिमांशु सिंह
Location : Sitapur
Published : 3 November 2026, 7:15 PM IST
Topics : Farmer Registration Problem Government Paddy Purchase Paddy MSP 2026 paddy procurement Sitapur News