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UP Panchayat Chunav (Img: Pinterest)
Allahabad: उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों को लेकर एक ऐसा कानूनी संकट खड़ा हो गया है जिसने राज्य सरकार की पूरी योजना पर पानी फेर दिया है। ग्राम प्रधानों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें ही प्रशासक के तौर पर नियुक्त करने की सरकार की मंशा को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बहुत बड़ा झटका लगा है। इस पूरे विवाद की जड़ में 26 साल पहले (वर्ष 2000 में) हुई एक गंभीर कानूनी और प्रशासनिक चूक है, जिस पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया। अब इसी 'डेड लॉ' (निष्प्रभावी कानून) के जाल में पूरी व्यवस्था फंस चुकी है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने 25 जून को इस मामले पर बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए अपना फैसला सुनाया। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि जो कानूनी प्रावधान पहले ही असांविधानिक घोषित किए जा चुके हैं, उनके सहारे ग्राम प्रधानों को दोबारा प्रशासक की भूमिका में नहीं बिठाया जा सकता। हाईकोर्ट ने न सिर्फ सरकार के इस कदम को खारिज किया, बल्कि बेहद सख्त लहजे में राज्य सरकार को आगामी 13 जुलाई तक पंचायत चुनावों की पूरी समय-सारणी और रूपरेखा (Election Blueprint) अदालत के समक्ष पेश करने का अंतिम अल्टीमेटम दे दिया है।
इस कानूनी पेंच की कहानी शुरू होती है वर्ष 1994 से, जब उत्तर प्रदेश पंचायतीराज अधिनियम, 1947 की धारा 12 में एक विशेष संशोधन करते हुए उपधारा 3-ए को जोड़ा गया था। इस नए नियम में यह व्यवस्था दी गई थी कि यदि किन्हीं अपरिहार्य परिस्थितियों या लोकहित के चलते ग्राम पंचायत का पांच साल का कार्यकाल समाप्त होने से पहले चुनाव कराना संभव न हो, तो वहां के कामकाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए प्रशासक या प्रशासनिक समिति की नियुक्ति की जा सकती है। इसी पुराने नियम की आड़ लेकर सरकारें अक्सर चुनावों को टालकर पसंदीदा लोगों या निवर्तमान प्रधानों को ही प्रशासक मनोनीत कर देती थीं।
अदालती दस्तावेजों के मुताबिक, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आज से 26 साल पहले यानी वर्ष 2000 में ही अपने एक ऐतिहासिक आदेश में इस व्यवस्था को पूरी तरह अवैध करार दे दिया था। कोर्ट ने तब स्पष्ट कहा था कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243 (ई) और 243 (के) के तहत किसी भी परिस्थिति में पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष से एक दिन भी अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता। धारा 12 (3-ए) का मनमाना इस्तेमाल करके चुनावों को अनिश्चितकाल के लिए टालना या प्रशासकों का कार्यकाल बढ़ाना सीधे तौर पर संविधान का उल्लंघन है।
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कानून के जानकारों का कहना है कि वर्ष 2000 के फैसले के बाद उत्तर प्रदेश सरकार के पास केवल दो ही रास्ते बचे थे। या तो वे विधायी प्रक्रिया के तहत धारा 12(3-ए) के संशोधन को पूरी तरह से निरस्त (Repeal) करते, या फिर हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर करते। दुर्भाग्य से, पिछले 26 वर्षों में किसी भी सरकार ने इन दोनों विकल्पों पर ध्यान नहीं दिया। इस लापरवाही का नतीजा यह हुआ कि यह प्रावधान कागजों पर तो जिंदा रहा, लेकिन कानूनी रूप से इसकी आत्मा मर चुकी थी। अब इसी प्रशासनिक लापरवाही का खामियाजा मौजूदा सरकार को भुगतना पड़ रहा है।
Location : Lucknow
Published : 29 June 2026, 1:46 PM IST
Topics : Allahabad High Court Latest Lucknow News UP Assembly Election 2027 up panchayat election 2026 UP Breaking News