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कांग्रेस और सपा का पूरा प्लान (Source: Pinterest)
उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। भाजपा और उसके सहयोगी दल जहां सरकार के कामकाज और जातीय समीकरणों के सहारे चुनावी जमीन मजबूत करने में जुटे हैं, वहीं विपक्ष भी हर विधानसभा सीट पर अपनी रणनीति तैयार कर रहा है। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच गठबंधन की संभावनाओं के बीच दोनों दलों ने युवाओं को जोड़ने की दिशा में नया फोकस किया है।
सपा और कांग्रेस ने समाजवादी तथा आंबेडकर विचारधारा से जुड़े युवाओं को चिह्नित कर उन्हें अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों की जिम्मेदारी देने की रणनीति बनाई है। इन प्रभारियों को ज्यादा से ज्यादा युवाओं को विचारधारा से जोड़ने और पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग के बीच संगठन को मजबूत करने का लक्ष्य दिया जा रहा है।
सपा ने कई दलित युवाओं को सामान्य सीटों पर प्रभारी बनाकर भी नया सियासी प्रयोग किया है। पार्टी का मानना है कि इससे परंपरागत वोटबैंक को लामबंद करने के साथ बसपा से नाराज युवाओं को भी अपने साथ जोड़ा जा सकता है।
समाजवादी पार्टी ने ऊंचाहार से मनोज पासवान, बाबागंज से शिवशंकर सरोज और कौशांबी-फतेहपुर से राम करन निर्मल को जिम्मेदारी दी है। मधुबन से विनीत कुशवाहा और कुशीनगर से राहुल राज को भी युवाओं के बीच काम करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
वहीं कांग्रेस ने भी संगठन को मजबूत करने के लिए युवाओं को मैदान में उतारा है। बलिया से शैलेंद्र ध्रुव यादव, बेल्थरा रोड से मुरली मनोहर, बिलग्राम से सुभाष पाल और गौरा से तरुण पटेल को युवाओं को जोड़ने का काम दिया गया है।
दूसरी ओर, बहुजन समाज पार्टी भी आगामी विधानसभा चुनाव में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश में है। पार्टी प्रमुख मायावती के ब्राह्मण वोटबैंक पर फिर से फोकस करने की चर्चा है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में कई प्रमुख ब्राह्मण नेता बसपा से अलग हो चुके हैं।
अंटू मिश्रा का निष्कासन इस सिलसिले की ताजा कड़ी बताया जा रहा है। पिछले एक दशक में कई ऐसे नेता पार्टी से दूर हुए, जिन्होंने बसपा के साथ अपनी राजनीतिक पहचान बनाई थी।
वर्ष 2007 में बसपा ने बड़ी संख्या में ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया था। इनमें 41 उम्मीदवार चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। बसपा की यह सोशल इंजीनियरिंग उस समय काफी सफल रही थी और बाद में दूसरे दलों ने भी अलग-अलग रूपों में इसे अपनाया।
हालांकि, 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद बसपा के कई प्रमुख ब्राह्मण नेताओं का पार्टी से मोहभंग देखने को मिला। ब्रजेश पाठक, नकुल दुबे, रामवीर उपाध्याय, रंगनाथ मिश्रा, विनय शंकर तिवारी और गणेश शंकर पांडेय जैसे कई नेता अलग-अलग समय पर बसपा से दूर हुए।
अब चुनाव से पहले सपा-कांग्रेस का युवाओं पर फोकस और बसपा की ब्राह्मण वोटबैंक को साधने की संभावित रणनीति यूपी के जातीय और सियासी समीकरणों को कितना प्रभावित करेगी, यह चुनावी नतीजों के साथ ही साफ होगा।
Location : Lucknow
Published : 16 August 2026, 10:16 AM IST