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गोरखपुर में सत्तासी स्टेट की छोटी रियासत से जुड़े रावतपार वंश की सातवीं पीढ़ी के प्रतिनिधि एवं वरिष्ठ अधिवक्ता स्वर्गीय संत सिंह का निधन हो गया। उनके देहावसान की खबर फैलते ही गोरखपुर शोक में डूब गया। उनका जाना न्याय, सादगी और संस्कार की एक जीवंत विरासत का अवसान है।
शोक में डूबा गोरखपुर
Gorakhpur: सत्तासी स्टेट की छोटी रियासत से जुड़े रावतपार वंश की सातवीं पीढ़ी के प्रतिनिधि एवं वरिष्ठ अधिवक्ता स्वर्गीय संत सिंह के निधन के साथ ही एक युग का अंत हो गया। 89 वर्ष की आयु में 31 जनवरी 2026 को उनके देहावसान की खबर फैलते ही गोरखपुर शोक में डूब गया। यह केवल एक वरिष्ठ अधिवक्ता का जाना नहीं था, बल्कि परंपरा, न्याय, सादगी और संस्कार की एक जीवंत विरासत का अवसान था।
स्वर्गीय संत सिंह के पिता स्वर्गीय राजबहादुर सिंह का वर्षों पूर्व गोरखपुर आगमन परिवार के इतिहास का निर्णायक क्षण माना जाता है। उसी समय से यह वंश गोरखपुर की सामाजिक, सांस्कृतिक और विधिक चेतना से गहराई से जुड़ गया। आज उसी शहर में, उसी भूमि पर सत्तासी स्टेट की छोटी रियासत की सातवीं पीढ़ी का यह दीप सदा के लिए बुझ गया।
मृत्यु की सूचना मिलते ही उनके आवास से लेकर राजघाट तक शोकाकुल जनसैलाब उमड़ पड़ा। रिश्तेदार, अधिवक्ता साथी, सामाजिक कार्यकर्ता और आम नागरिक हर आंख नम किए अंतिम दर्शन को पहुंचे। अधिवक्ता जगत में वे एक मार्गदर्शक, न्यायप्रिय और स्नेही वरिष्ठ के रूप में प्रतिष्ठित थे। उनका जीवन अनुशासन, मर्यादा और सरलता की मिसाल था।
पारिवारिक कारणों से अंतिम संस्कार तीन दिन बाद किया गया। उनकी 78 वर्षीय पत्नी लीलावती देवी सितंबर 2025 से पुत्रों के साथ मुंबई में रह रही थीं। 25 दिसंबर 2025 को उन्हें फालिज का गंभीर दौरा पड़ा और मुंबई के ट्रेना अस्पताल के आईसीयू में भर्ती किया गया। इसी बीच 31 जनवरी को संत सिंह का निधन हो गया।
पुत्रों ने संवेदनशीलता और पुत्र धर्म की मिसाल पेश करते हुए चिकित्सकीय अनुमति के बाद आईसीयू एंबुलेंस से मां को गोरखपुर लाकर पति के अंतिम दर्शन कराए। इसी कारण अंतिम संस्कार में विलंब हुआ, लेकिन इस निर्णय ने पूरे समाज को भावुक कर दिया। हर जुबां पर एक ही बात थी— “बच्चे हों तो ऐसे हों।”
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सोमवार को राजघाट स्थित राप्ती नदी के तट पर अंतिम संस्कार के दौरान घाट श्रद्धा, सम्मान और मौन प्रार्थनाओं से भर गया। पुष्पांजलि अर्पित करते हुए लोगों ने नम आंखों से उन्हें अंतिम विदाई दी।
1967 में उनका विवाह खजूरी निवासी उग्रसेन शाही की बहन लीलावती शाही से हुआ था। उनके छह पुत्र थे, जिनमें से गौरव सिंह का दो वर्ष पूर्व निधन हो चुका है। शेष पुत्र—संजय सिंह, सुधीर सिंह, पवन सिंह, ऋषि कुमार सिंह और कृष्ण कुमार सिंह—आज भी उनके संस्कारों और मूल्यों को आगे बढ़ा रहे हैं।
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स्वर्गीय संत सिंह का जाना गोरखपुर के लिए अपूरणीय क्षति है। सत्तासी स्टेट की छोटी रियासत की सातवीं पीढ़ी की यह गाथा यहीं थमी, लेकिन उनका व्यक्तित्व, आदर्श और स्मृतियां शहर के इतिहास में सदैव जीवित रहेगा।