डिजिटल अरेस्ट का जाल: 27 दिन तक डराते रहे साइबर अपराधी, रिटायर्ड ट्रेजरी ऑफिसर से 84.50 लाख रुपये ठगे

लखनऊ में साइबर ठगों ने एक सेवानिवृत्त ट्रेजरी ऑफिसर को 27 दिन तक डिजिटल अरेस्ट के नाम पर डराकर 84 लाख 50 हजार रुपये ठग लिए। खुद को पुलिस और ATS अधिकारी बताकर आरोपियों ने मनी लॉन्ड्रिंग केस में फंसाने की धमकी दी। पुलिस ने शिकायत के बाद जांच शुरू कर दी है और 27 लाख रुपये फ्रीज कराए हैं।

Post Published By: Asmita Patel
Updated : 28 April 2026, 2:26 PM IST
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Lucknow: लखनऊ में साइबर अपराध का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने ऑनलाइन ठगी के बढ़ते खतरे को फिर उजागर कर दिया है। साइबर जालसाजों ने एक सेवानिवृत्त ट्रेजरी ऑफिसर को करीब 27 दिन तक मानसिक दबाव में रखकर 84 लाख 50 हजार रुपये ठग लिए। ठगों ने खुद को पुलिस, ATS और सरकारी एजेंसियों का अधिकारी बताकर पीड़ित को इस कदर डराया कि वह किसी से बात तक नहीं कर पाए।

मामला जानकीपुरम के सेक्टर-जी इलाके का है, जहां रहने वाले बदरुद्दीन अंसारी को साइबर अपराधियों ने मनी लॉन्ड्रिंग केस में फंसाने की धमकी दी। ठगों ने उन्हें यह यकीन दिला दिया कि उनका नाम बड़े वित्तीय अपराध में सामने आया है और जल्द ही गिरफ्तारी हो सकती है। इसी डर और दबाव में उन्होंने कई बार में करोड़ों की जमा पूंजी ठगों के खातों में ट्रांसफर कर दी।

व्हाट्सएप कॉल से शुरू हुआ पूरा खेल

पीड़ित बदरुद्दीन अंसारी के मुताबिक सात मार्च को उनके पास एक अंजान नंबर से व्हाट्सएप कॉल आई। कॉल करने वाले व्यक्ति ने अपना नाम प्रमोद कुमार मिश्र बताया और कहा कि वह पुलिस हेड क्वार्टर लखनऊ से बोल रहा है। फोन करने वाले ने कहा कि महाराष्ट्र में चल रहे मनी लॉन्ड्रिंग केस में उनका नाम सामने आया है। आरोप लगाया गया कि उनके नाम पर एचडीएफसी बैंक में फर्जी खाता खोलकर अवैध लेन-देन किया गया है। शुरुआत में बदरुद्दीन को यह बात समझ नहीं आई, लेकिन ठगों ने बेहद पेशेवर अंदाज में बातचीत कर उन्हें भरोसे में लेना शुरू कर दिया।

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फर्जी दस्तावेज भेजकर बनाया भरोसे का माहौल

साइबर ठगों ने सिर्फ फोन कॉल पर भरोसा नहीं छोड़ा। उन्होंने पीड़ित के व्हाट्सएप पर कई सरकारी दस्तावेज भी भेजे। इनमें कथित तौर पर एनआईए, आरबीआई और सुप्रीम कोर्ट के नाम से जारी कागजात शामिल थे। इन दस्तावेजों को देखकर बदरुद्दीन को लगा कि मामला सचमुच सरकारी जांच से जुड़ा हुआ है। ठगों ने खुद को ATS अधिकारी बताते हुए कहा कि जांच पूरी होने तक उन्हें किसी से बात नहीं करनी चाहिए।

बैंक खातों की जानकारी लेकर खाते खाली करवाए

जालसाजों ने धीरे-धीरे पीड़ित से उनके सभी बैंक खातों की जानकारी हासिल कर ली। उन्हें कहा गया कि जांच प्रक्रिया के तहत खातों की सत्यापन जांच करनी होगी। इसके बाद ठगों ने अलग-अलग खातों में रकम ट्रांसफर कराने की प्रक्रिया शुरू की। 11 मार्च से लेकर चार अप्रैल तक कई चरणों में कुल 84 लाख 50 हजार रुपये ट्रांसफर करवा लिए गए। हर बार पीड़ित को यह भरोसा दिया गया कि जांच पूरी होने के बाद पूरी रकम वापस कर दी जाएगी। लेकिन जब लंबे समय तक पैसा वापस नहीं मिला तो उन्हें शक हुआ।

27 दिन तक ‘डिजिटल अरेस्ट’ में रहे पीड़ित

इस पूरे मामले की सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि बदरुद्दीन करीब 27 दिन तक डिजिटल अरेस्ट जैसी स्थिति में रहे। डिजिटल अरेस्ट का मतलब है कि ठग लगातार फोन, वीडियो कॉल या ऑनलाइन निगरानी के जरिए व्यक्ति को मानसिक रूप से नियंत्रित करते रहते हैं। पीड़ित को ऐसा महसूस कराया जाता है कि वह किसी जांच एजेंसी की निगरानी में है और उसके हर कदम पर नजर रखी जा रही है।

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ठगी का एहसास होने पर पहुंचा मामला पुलिस तक

जब रकम वापस नहीं मिली और कॉल करने वालों ने जवाब देना बंद कर दिया, तब बदरुद्दीन को एहसास हुआ कि उनके साथ साइबर ठगी हुई है। इसके बाद उन्होंने साइबर क्राइम पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई और फिर साइबर क्राइम थाने पहुंचकर लिखित तहरीर दी। पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी।

पुलिस ने 27 लाख रुपये फ्रीज कराए

साइबर क्राइम थाने के इंस्पेक्टर ब्रजेश कुमार के मुताबिक शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की। जांच के दौरान ठगों के बैंक खातों की जानकारी जुटाई गई। पुलिस ने अब तक करीब 27 लाख रुपये फ्रीज करा दिए हैं। अधिकारियों का कहना है कि बाकी रकम का पता लगाने और आरोपियों की पहचान के लिए बैंकिंग ट्रांजेक्शन और डिजिटल रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं।

Location :  Lucknow

Published :  28 April 2026, 2:26 PM IST

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