Opinion: विदेश नीति, कोरोना और अब डीजल-पेट्रोल के दामों को लेकर चौतरफा घिरी सरकार

मनोज टिबड़ेवाल आकाश

चीन, नेपाल, पाकिस्तान, भूटान के साथ हाल के दिनों में उपजे तनाव ने भारत की विदेश नीति को कटघरे में खड़ा किया है। इससे पहले कोरोना वायरस के चलते प्रवासी मजदूरों की सुरक्षित घर वापसी मोदी सरकार के लिए बड़ा सिरदर्द साबित हो चुकी है। इन दो बड़े मोर्चों से केन्द्र सरकार किसी तरह निपट ही रही थी कि बीते 15 दिनों से लगातार बढ़ रहे पेट्रोल-डीजल की बेतहाशा कीमतों ने सरकार को सीधे-सीधे विपक्षी दलों और आम जनता के निशाने पर ला दिया है।

2014 के चुनावों के वक्त का भाजपा का सबसे प्रिय नारा
2014 के चुनावों के वक्त का भाजपा का सबसे प्रिय नारा

नई दिल्ली: पिछले कई महीने से केन्द्र की मोदी सरकार कई मोर्चों पर एक साथ घिरी नज़र आ रही है। सरकार से जवाब देते नहीं बन रहा है और यदि सरकार जवाब दे रही है तो उससे विपक्ष और आम जनता संतुष्ट नहीं हो पा रही है। सड़कों पर जगह-जगह विपक्षी दलों के प्रदर्शन हो रहे हैं। हालांकि आम चुनाव अभी चार साल दूर हैं लेकिन सरकार ने समय रहते आक्रोशों को नहीं थमा तो अगला चुनाव सरकार पर भारी भी पड़ सकता है। 

हैरान करने वाली बात ये है कि इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि डीजल के दाम पेट्रोल से अधिक हो गये। इसके बाद तो हाय-तौबा मचनी स्वभाविक थी। सरकार भले कहे कि यह हमारे नहीं पेट्रोलियम कंपनियों के हाथ में है लेकिन जनता के गले यह दलील नहीं उतर रही। ऊपर से टीवी चैनलों पर सत्तारुढ़ दल के राज्यों में वैट की दरें घटा कर कीमतें कुछ हद तक कम कर देती हैं तो मानों यह जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा होता है। कम से कम ये भौंडे तर्क देने से पहले भाजपा के प्रवक्ता अपनी राज्य सरकारों से तो ये करा देते। 
कहने की आवश्यकता नहीं कि इस समय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमत यूपीए सरकार की तुलना में बेहद कम है, इसके बावजूद डीजल-पेट्रोल के दाम कम न होना मोदी सरकार के महंगाई कम करने के दावों पर सवाल खड़े करने को काफी हैं।

याद करिये 2014 की शुरुआत के वो चुनावी महीने.. जब जगह-जगह भाजपा नेताओं के मुंह से यही बात निकलती थी, “बहुत हुई महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार” इसी नारे के सहारे सत्ता में काबिज हुई मोदी सरकार सत्ता में आते ही इस वायदे को भूल गयी और हालत इतने बदतर हो गये कि इतिहास के सबसे महंगे दर पर डीजल-पेट्रोल के दाम पहुंच गये। पेट्रोल से महंगा डीजल बिकने लगा, यह तो कम से कम आज के पहले कभी नहीं हुआ था। कोरोना काल में किसानों की हालत पहले से पतली थी लेकिन डीजल की महंगाई से उनकी खेती-किसानी और बुरे हाल में पहुंच गयी है।
सरकार को शायद इस बात का एहसास नहीं है कि सोशल मीडिया पर आम जनता उनके नेताओं के पुराने वीडियो क्लिपिंग्स को निकाल किस तरह उनके मजाक उड़ा रही है। मोदी से लेकर स्मूति ईरानी, रविशंकर प्रसाद से लेकर मुख्तार अब्बास नकवी, प्रकाश जावड़ेकर से लेकर राजनाथ सिंह के 2012, 2013 और 2014 के वीडियो, चुनावी भाषणों की क्लिपिंग्स, फोटोग्राफ्स और ट्विटर के स्क्रीनशॉट्स खूब वायरल हो रहे हैं और इनकी जमकर खिल्लियां उड़ायी जा रही है कि जब ये सत्ता से बाहर थे तब खूब यूपीए सरकार को खरी-खोटी सुनाते थे और आज चुप बैठे हैं।

इस अंदाज में हुआ भाजपा का 2014 में चुनावी प्रचार 

जनता की इस आलोचना के एक और बड़े शिकार बने हैं योग गुरु स्वामी रामदेव। 2013-14 में ये टीवी चैनलों पर लोगों से सवाल पूछते थे कि जनता को कौन सी सरकार चाहिये 35 रुपये पेट्रोल देने वाली या फिर 75-80 रुपये देने वाली? आज बाबा रामदेव से भी कोई जवाब देते नहीं बन रहा है। समय रहते सरकार नहीं जागी तो फिर अगला चुनाव सरकार पर भारी पड़ जाये तो कोई आश्चर्य नहीं। 

(लेखक मनोज टिबड़ेवाल आकाश नई दिल्ली में बतौर वरिष्ठ पत्रकार कार्यरत हैं और वर्तमान में डाइनामाइट न्यूज़ के एडिटर-इन-चीफ हैं। इन्होंने दूरदर्शन समाचार, नई दिल्ली में एक दशक तक टेलीविजन न्यूज़ एंकर और वरिष्ठ राजनीतिक संवाददाता के रूप में कार्य किया है। इन्होंने लंबे समय तक डीडी न्यूज़ पर प्रसारित होने वाले लोकप्रिय इंटरव्यू बेस्ड टॉक शो ‘एक मुलाक़ात’ को बतौर एंकर होस्ट किया है। इन्हें प्रिंट, इलेक्ट्रानिक और डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने का दो दशक का अनुभव है)

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