बुलंदशहर हिंसा: कब रुकेगा पुलिस वालों की मौत का सिलसिला? मेरठ जोन के एडीजी प्रशांत कुमार की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल

डीएन संवाददाता

राज्य का सबसे महत्वपूर्ण जोन माना जाता है मेरठ। नोएडा, गाजियाबाद को समेटे इस इलाके की कमान संभाले हुए हैं एडीजी प्रशांत कुमार। इनकी कार्यप्रणाली पर बुलंदशहर की वीभत्स हिंसा के बाद गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। घटना के बाद रस्म अदायगी, मौके पर पहुंचना और लीपा-पोती एडीजी द्वारा तेज कर दी गयी है। डाइनामाइट न्यूज़ एक्सक्लूसिव..

लाल घेरे में एडीजी प्रशांत कुमार की संदिग्ध कार्यप्रणाली
लाल घेरे में एडीजी प्रशांत कुमार की संदिग्ध कार्यप्रणाली

लखनऊ: जुगाड़ के सहारे पोस्टिंग पाने वाले पुलिस अफसर मलाईदार पोस्टिंग पाने के बाद सिर्फ उसे बचाने की जुगत में भिड़े रहते हैं। इन्हें न तो सीएम योगी आदित्यनाथ की इमेज से कोई मतलब है और न ही अपने इलाके की कानून-व्यवस्था से।   

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इसी इलाके में हुई घटना

डाइनामाइट न्यूज़ इस समय बात कर रहा है राज्य की आज की सबसे बड़ी खबर बुलंदशहर हिंसा की। 

आरोपों के घेरे में हैं कामधेनू गाय के रुप में कुख्यात मेरठ जोन के एडीजी प्रशांत कुमार। 1990 बैच के यूपी कैडर के आईपीएस प्रशांत मूल रुप से बिहार के रहने वाले हैं।  

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खून से लथपथ मृत इंस्पेक्टर

आये दिन वीकेंड पर लखनऊ से महकमे के उच्च अफसरों को बुलाकर बैठक और फीटा कटाने के नाम पर अपनी पीआर को मजबूत करने के लिए बदनाम प्रशांत अपने जोन में थोड़ा सा भी ध्यान मातहतों पर दे देते तो शायद तस्वीर दूसरी होती और मुख्यमंत्री को इनके कारनामों की वजह से जगह-जगह जवाब नही देना पड़ता।  

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पत्नी के साथ इंस्पेक्टर सुबोध सिंह (फाइल फोटो)

समूचे मामले में जिला प्रशासन, पुलिस और इलाकाई खुफिया तंत्र कुंभकर्णी नींद में सोया हुआ था और जब हिंसा हो गयी तो सब एक साथ टूट पड़े लीपा-पोती के खेल में। आखिर इनका बिगड़ेगा भी तो क्या.. हद से हद ट्रांसफर.. फिर सेटिंग-गेटिंग के खेल में कुछ समय बाद कुर्सी तो मिल ही जायेगी। यही सोच ये मगरमच्छ की खाल वाले अफसर जगह-जगह सीएम की भद पिटवाने में लगे हुए हैं।

बुलंदशहर में हिंसा और तांडव की भेंट एक इंस्पेक्टर चढ़ गया और एडीजी साहब.. रस्म अदायगी के लिए आईजी रामकुमार के साथ मौके पर पहुंच गये पत्रकारों के बीच यह जताने की.. अब तनाव जैसी कोई बात नही है.. चारो ओर परम शांति है।    

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आगजनी के शिकार वाहन

 

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बड़ा सवाल तो यह है कि क्या गोकशी और इन पर कोई एक्शन न लिए जाने के बाद उपजी हिंसा एक मिनट में हो गयी? आखिर ये बड़ अफसर अपने दफ्तरों में बैठकर करते क्या हैं सिर्फ पीआर.. कुर्सी बचाने का मैनेजमेंट? 

 

हिंदू संगठनों का आरोप तो यही है.. कि इलाके में लंबे समय से गोकशी का खेल चल रहा है और पुलिस कोई कार्यवाही नही कर रही.. जब लोग शिकायत लेकर एसएसपी, आईजी और एडीजी के पास जाते हैं तो उन्हें भगा दिया जाता है और जब हिंसा हो जाती है, फोर्स का कोतवाल शहीद हो जाता है, और बड़ी संख्या में पुलिस वाले चोटिल हो जाते हैं तो मामले में लीपा-पोती शुरु हो जाती है। 

बड़ा सवाल तो ये है कि आखिर कब रुकेगा पुलिस वालों की मौत का सिलसिला? 

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