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भारतीय न्याय व्यवस्था की आवाज़ कहे जाने वाले दिग्गज वकील उज्ज्वल निकम अब देश की संसद में अपनी बात रखेंगे। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें राज्यसभा के लिए नामांकित किया है। ये नामांकन केवल एक कानूनी विशेषज्ञ को नहीं, बल्कि न्याय के लिए जीवन समर्पित कर देने वाले उस शख्स को सम्मानित करने जैसा है, जिसने अजमल कसाब जैसे आतंकी को फांसी के तख्ते तक पहुंचाया और देश में न्याय पर विश्वास को मजबूत किया।
जानिए कौन हैं उज्ज्वल निकम (सोर्स इंटरनेट)
New Delhi: भारतीय न्याय व्यवस्था की आवाज़ कहे जाने वाले दिग्गज वकील उज्ज्वल निकम अब देश की संसद में अपनी बात रखेंगे। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें राज्यसभा के लिए नामांकित किया है। ये नामांकन केवल एक कानूनी विशेषज्ञ को नहीं, बल्कि न्याय के लिए जीवन समर्पित कर देने वाले उस शख्स को सम्मानित करने जैसा है, जिसने अजमल कसाब जैसे आतंकी को फांसी के तख्ते तक पहुंचाया और देश में न्याय पर विश्वास को मजबूत किया।
निकम को यह मनोनयन उनके चार दशकों से अधिक लंबे कानूनी करियर और अपराध के खिलाफ उनकी अद्वितीय भूमिका के चलते दिया गया है। इससे पहले 2024 लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उन्हें मुंबई नॉर्थ सेंट्रल सीट से टिकट देकर चुनावी मैदान में उतारा था, हालांकि वे चुनाव नहीं जीत पाए। अब उन्हें राज्यसभा की गरिमामयी कुर्सी से देश सेवा का अवसर मिला है।
उज्ज्वल निकम का जन्म मार्च 1953 में महाराष्ट्र के जलगांव में हुआ। उनके पिता देवरावजी निकम खुद एक वकील और जज रह चुके हैं। कानून का यह संस्कार उज्ज्वल को बचपन से मिला। उन्होंने पुणे विश्वविद्यालय से बीएससी और फिर एसएस मनियार लॉ कॉलेज (जलगांव) से कानून की पढ़ाई पूरी की।
निकम ने 1979 में जलगांव जिला अदालत से अपने करियर की शुरुआत की थी। कानून की गहराइयों को समझते हुए वे धीरे-धीरे बड़े मामलों में शामिल होते चले गए। 14 वर्षों तक टाडा अदालत में सेवाएं देने के बाद, उन्हें असली पहचान तब मिली जब वे 1993 मुंबई ब्लास्ट केस में लोक अभियोजक नियुक्त किए गए। यह मामला करीब 10 वर्षों तक चला, जिसमें 100 से अधिक दोषियों को सजा दिलाई गई। वे हर सुनवाई के बाद मीडिया को घटनाक्रम बताते, जिससे आम लोग भी कोर्ट की जटिलता को समझ पाते। यहीं से वे एक लोकप्रिय चेहरे बने।
निकम का करियर तब शिखर पर पहुंचा जब उन्हें 26/11 मुंबई आतंकी हमले के एकमात्र जीवित आतंकी अजमल कसाब के खिलाफ लोक अभियोजक बनाया गया। देशभर की निगाहें इस केस पर थीं और निकम ने अपने तथ्यों व तर्कों से कसाब को फांसी की सजा दिलवाई। यह मुकदमा भारतीय न्याय व्यवस्था के इतिहास में एक मिसाल बन गया।
उनका नाम गुलशन कुमार हत्याकांड, शक्ति मिल्स गैंगरेप, और कई हाई-प्रोफाइल मामलों से भी जुड़ा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उज्ज्वल निकम ने अब तक 628 लोगों को उम्रकैद और 37 आरोपियों को फांसी की सजा दिलवाई है। वर्ष 2016 में उन्हें पद्मश्री से नवाजा गया।
चुनावी हार के बावजूद निकम को कानून के क्षेत्र में उनके अभूतपूर्व योगदान के कारण यह संसद की भूमिका सौंपी गई है। उनके अनुभव, तर्क और कानून की समझ अब राज्यसभा में गूंजेगी, जो निश्चित रूप से राष्ट्रीय नीतियों और न्याय से जुड़ी चर्चाओं को नई दिशा दे सकती है।
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