Muharram 2026: क्यों खास है मुहर्रम की 10वीं तारीख? जानें यजीद के जुल्म के आगे क्यों नहीं झुके थे इमाम हुसैन

मुहर्रम 2026 की शुरुआत के बाद 26 जून को 'यौम-ए-आशूरा' मनाया जाएगा। जानिए पैगंबर के नवासे इमाम हुसैन की कर्बला में हुई ऐतिहासिक शहादत, आशूरा का महत्व और शिया-सुन्नी समुदाय की परंपराओं के बारे में।

Post Published By: Tanya Chand
Updated : 19 June 2026, 11:04 AM IST
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New Delhi: इस्लामी कैलेंडर के पहले महीने मुहर्रम की शुरुआत 17 जून 2026 को हो चुकी है। मुहर्रम का महीना आते ही दुनिया भर के मुस्लिम समुदाय में गम और इबादत का माहौल छा जाता है। इस पूरे महीने में 'आशूरा' यानी मुहर्रम के 10वें दिन को सबसे पवित्र और ऐतिहासिक माना गया है। वर्ष 2026 में यौम-ए-आशूरा 26 जून को मनाया जाएगा। अरबी भाषा में 'आशूरा' का शाब्दिक अर्थ 'दसवां' होता है। यह दिन इस्लामी इतिहास में सब्र, सच्चाई और सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक माना जाता है।

क्या है आशूरा और इसका महत्व?

अरबी भाषा में मुहर्रम का सीधा संबंध ग़म यानी शोक से माना गया है। रमज़ान के पाक महीने के बाद इस्लाम में मुहर्रम को दूसरा सबसे पवित्र महीना माना जाता है। आशूरा का दिन विशेष रूप से पैगंबर मुहम्मद के नवासे (पोते) इमाम हुसैन इब्न अली की शहादत को समर्पित है। इस दिन शिया मुस्लिम समुदाय के लोग औपचारिक तौर पर मातम मनाते हैं और मजलिसों का आयोजन करते हैं। आशूरा को केवल एक तारीख नहीं, बल्कि हक (सच्चाई), वफादारी और अत्याचार के खिलाफ अडिग रहने की एक महान मिसाल के रूप में देखा जाता है।

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कर्बला का इतिहास और इमाम हुसैन की शहादत

आशूरा का इतिहास इराक के कर्बला के मैदान से जुड़ा हुआ है। सदियों पहले मुहर्रम की 10वीं तारीख को ही इमाम हुसैन ने अपने परिवार और वफादार साथियों के साथ मिलकर यजीद की दमनकारी सत्ता और उसके अत्याचारों के खिलाफ जंग लड़ी थी। यह लड़ाई किसी जमीन या राजपाठ के लिए नहीं, बल्कि इंसानियत, सत्य और न्याय की रक्षा के लिए थी। कर्बला की इस भीषण जंग में इमाम हुसैन ने सत्य की राह पर चलते हुए अपनी जान कुर्बान कर दी थी। यही कारण है कि दुनिया भर के मुसलमान इस दिन को बेहद सम्मान और गम के साथ याद करते हैं।

खिलाफत का विवाद और कर्बला का वो मंजर

इस्लामी इतिहास के अनुसार, पैगंबर हज़रत मुहम्मद की वफात (निधन) के बाद मुस्लिम समुदाय का नेतृत्व करने के लिए आपसी सहमति से खलीफा का चुनाव किया जाता था। खलीफा पूरी दुनिया के मुसलमानों का धार्मिक और सामाजिक प्रमुख होता था। लेकिन एक दौर ऐसा आया जब सीरिया के क्रूर शासक यज़ीद ने खुद को जबरन खलीफा घोषित कर दिया। यजीद का शासन इस्लामी सिद्धांतों और मानवीय मूल्यों के पूरी तरह खिलाफ था।

जब यजीद ने इमाम हुसैन से अपने शासन को स्वीकार करने (बैअत करने) को कहा, तो हुसैन ने साफ इनकार कर दिया। उन्होंने इस्लाम और मानवता की रक्षा के लिए यजीद के सामने झुकने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना। इसके बाद यजीद ने कर्बला के तपते मैदान में इमाम हुसैन, उनके छोटे बच्चों और साथियों का पानी तक बंद कर दिया। इस कठिन परिस्थिति में इमाम हुसैन के 72 साथी एक-एक कर शहीद हो गए और अंत में इमाम हुसैन ने भी सत्य की राह में अपनी शहादत दे दी।

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यौम-ए-आशूरा पर कैसे दी जाती है श्रद्धांजलि?

आशूरा के दिन मुस्लिम समुदाय के अलग-अलग धड़े अपनी परंपराओं के अनुसार इबादत करते हैं:

  • सुन्नी समुदाय: सुन्नी परंपराओं के अनुसार, इस पवित्र दिन पर लोग अल्लाह की इबादत करते हैं, विशेष दुआएं मांगते हैं और रोज़ा रखते हैं।
  • शिया समुदाय: शिया मुस्लिम इस दिन कर्बला के शहीदों की याद में काले कपड़े पहनकर शोक व्यक्त करते हैं। इस दिन बड़ी तादाद में लोग इकट्ठा होकर जुलूस (ताजिया) निकालते हैं और इमाम हुसैन के बलिदान को याद कर मातम मनाते हैं।

Location :  New Delhi

Published :  19 June 2026, 11:04 AM IST

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