खन्ना रेल हादसे में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 28 साल बाद दादा को मिला मुआवजा बरकरार; रेलवे की अपील खारिज

1998 के खन्ना रेल हादसे में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए दादा को दिए गए 4 लाख रुपये मुआवजे को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि निर्भरता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि भावनात्मक भी होती है।

Post Published By: Tanya Chand
Updated : 4 June 2026, 11:44 AM IST
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Chandigarh: वर्ष 1998 के खन्ना रेल दुर्घटना मामले में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने केंद्र सरकार और उत्तरी रेलवे की अपील को खारिज करते हुए रेलवे दावा अधिकरण के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें दावेदार दादा को चार लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्णय दिया गया था। यह फैसला करीब 28 वर्ष बाद आया है।

खन्ना रेल हादसे की दर्दनाक पृष्ठभूमि

यह हादसा 26 नवंबर 1998 को खन्ना-लुधियाना रेलखंड पर हुआ था, जिसे देश के सबसे भयावह रेल हादसों में गिना जाता है। इस दुर्घटना में कोलकाता जा रही सियालदह एक्सप्रेस और अमृतसर जाने वाली ट्रेन की टक्कर और पटरी से उतरने की घटना शामिल थी। दोनों ट्रेनों में करीब 2500 यात्री सवार थे और इस भीषण हादसे में लगभग 212 लोगों की जान चली गई थी।

मुआवजे को लेकर रेलवे की दलील

रेलवे दावा अधिकरण ने दावेदार दादा के पक्ष में चार लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था। हालांकि केंद्र सरकार और उत्तरी रेलवे ने इस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। उनका तर्क था कि रेलवे अधिनियम के तहत केवल वही व्यक्ति मुआवजे का पात्र है जो मृतक पर आर्थिक रूप से निर्भर हो।

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अदालत ने दी निर्भरता की व्यापक व्याख्या

सुनवाई के दौरान जस्टिस पंकज जैन ने स्पष्ट किया कि निर्भरता को केवल आर्थिक दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता। अदालत ने कहा कि परिवार के भीतर प्रेम, स्नेह, देखभाल और भावनात्मक सहारा भी निर्भरता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में इसे केवल वित्तीय सहायता तक सीमित करना उचित नहीं होगा।

दादा-पोती के रिश्ते को माना विशेष

हाईकोर्ट ने कहा कि दादा और पोती के बीच एक विशेष भावनात्मक संबंध होता है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि भले ही दादा अपनी पोती पर आर्थिक रूप से निर्भर नहीं थे, लेकिन भावनात्मक और पारिवारिक स्तर पर यह निर्भरता महत्वपूर्ण है। इस आधार पर दादा को मुआवजे से वंचित नहीं किया जा सकता।

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मुआवजा आदेश को बताया न्यायसंगत

अदालत ने कहा कि दावेदार का कोई अन्य पोता या पोती नहीं था, जिससे यह रिश्ता और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। हाईकोर्ट ने रेलवे की अपील को खारिज करते हुए रेलवे दावा अधिकरण के फैसले को सही ठहराया और चार लाख रुपये के मुआवजे को पूरी तरह बरकरार रखा।

Location :  Chandigarh

Published :  4 June 2026, 11:44 AM IST

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