उत्तर प्रदेश की राजनीति में नया भूचाल लाने की तैयारी में सपा, 2027 के चुनाव में अपनाएगी ‘PDA 2.0’ का पैंतरा

यूपी विधानसभा चुनाव 2027 के लिए सपा प्रमुख अखिलेश यादव PDA 2.0 रणनीति तैयार कर रहे हैं। पार्टी आरक्षित के साथ-साथ सामान्य सीटों पर भी 15-20 दलित उम्मीदवार उतारकर बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग को कड़ी टक्कर देने और नए राजनीतिक समीकरण साधने की तैयारी में है।

Updated : 31 July 2026, 8:28 AM IST
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Lucknow: उत्तर प्रदेश की सियासत में समाजवादी पार्टी ने एक बार फिर से मास्टरस्ट्रोक खेलने की पूरी तैयारी कर ली है। लोकसभा चुनाव 2024 में 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के फॉर्मूले के जरिए धमाकेदार सफलता हासिल करने के बाद, अब सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने साल 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए 'PDA 2.0' की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। इस बार पार्टी का मकसद सिर्फ नारों तक सीमित रहना नहीं है, बल्कि टिकट बंटवारे में भी दलित वर्ग को ऐतिहासिक हिस्सेदारी देना है, जिसके तहत सामान्य सीटों पर भी दलित उम्मीदवारों को मैदान में उतारने का बड़ा दांव चला जा रहा है।

सामान्य सीटों पर दलित चेहरों को उतारने की तैयारी

राजनीतिक गलियारों में चर्चा जोरों पर है कि समाजवादी पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव में 100 से ज्यादा दलित और आदिवासी उम्मीदवार उतारने का खाका तैयार कर रही है। खास बात यह है कि इस योजना के तहत सिर्फ आरक्षित सीटें ही नहीं, बल्कि 15 से 20 सामान्य सीटों पर भी दलित चेहरों को मौका दिया जाएगा।

अगर पिछले आंकड़ों पर नजर डालें तो साल 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा ने आरक्षित सीटों के अलावा सामान्य वर्ग की सिर्फ 3 सीटों पर ही दलित उम्मीदवार खड़े किए थे। लेकिन अब पार्टी पश्चिमी उत्तर प्रदेश समेत उन तमाम इलाकों पर खास फोकस कर रही है जहां दलितों की आबादी अच्छी खासी है। पार्टी का मानना है कि सामान्य सीटों पर दलित प्रत्याशी उतारने से न सिर्फ उस सीट पर बल्कि आसपास के पूरे क्षेत्र में राजनीतिक समीकरण बदल जाएंगे और मजबूत ध्रुवीकरण देखने को मिलेगा।

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बीजेपी के सोशल इंजीनियरिंग को मात देने की रणनीति

सपा की इस नई रणनीति के पीछे का मुख्य उद्देश्य भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की सोशल इंजीनियरिंग को करारी टक्कर देना है। पिछले एक दशक से बीजेपी गैर-यादव पिछड़ों और गैर-जाटव दलितों के समीकरण के दम पर उत्तर प्रदेश की सत्ता में मजबूती से काबिज रही है। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने इस किले में बड़ी सेंध लगाई थी। अब सपा साल 2027 के रण में इसी सफलता को और बड़े पैमाने पर दोहराना चाहती है।

इसके साथ ही, राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बसपा के कमजोर होने के बाद उत्तर प्रदेश का एक बड़ा दलित वर्ग अपने लिए नए राजनीतिक विकल्प की तलाश में है। सपा इस खाली राजनीतिक स्पेस को भरकर उस वर्ग का सबसे बड़ा हमदर्द बनकर उभरना चाहती है।

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बीजेपी भी दे रही है कड़ी टक्कर

भले ही समाजवादी पार्टी ने बड़ा दांव चल दिया हो, लेकिन सत्ताधारी बीजेपी भी इस सियासी खेल से पूरी तरह वाकिफ है। दलितों पर अपनी पैट मजबूत बनाए रखने के लिए बीजेपी ने संत रविदास समरसता संकल्प अभियान की शुरुआत कर दी है। इसके अलावा, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा भदोही का नाम दोबारा संत रविदास नगर करने का ऐलान करना यह साफ बताता है कि बीजेपी, सपा के दलित-सम्मान वाले नैरेटिव को कमजोर करने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है।

ऐसे में समाजवादी पार्टी के लिए यह रास्ता इतना आसान भी नहीं रहने वाला है। सामान्य सीटों पर दलित उम्मीदवारों को उतारने से पार्टी के सामने स्थानीय स्तर पर पुराने और स्थापित दावेदारों को साधने और नाराज करने की बड़ी चुनौती भी खड़ी होगी। देखना यह होगा कि सपा का यह 'PDA 2.0' फॉर्मूला चुनावी वैतरणी पार कराने में कितना कारगर साबित होता है।

Location :  Lucknow

Published :  31 July 2026, 8:28 AM IST

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