‘कल जेन अल्फा-बीटा भी आएगी’, केस वापसी पर सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस, CJI सूर्यकांत बोले- हिंसा रोकने के लिए…

छात्र प्रदर्शन के दौरान दर्ज मामलों को वापस लेने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में बड़ी बहस हुई। एक वकील ने चेतावनी दी कि ऐसा फैसला भविष्य के आंदोलनों के लिए गलत उदाहरण बन सकता है और कहा, “कल जेन अल्फा-बीटा भी आएगी।”

Post Published By: Nidhi Kushwaha
Updated : 5 August 2026, 6:41 PM IST
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New Delhi: सुप्रीम कोर्ट में छात्र प्रदर्शन के दौरान दर्ज आपराधिक मामलों को वापस लेने की मांग को लेकर बुधवार को अहम बहस हुई। सुनवाई के दौरान एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने चेतावनी दी कि अगर राजनीतिक फैसले के आधार पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामले वापस किए जाते हैं, तो इससे भविष्य में गलत मिसाल बन सकती है।

उन्होंने कहा, “कल जेनरेशन अल्फा, बीटा और डेल्टा भी आएगी।” इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने युवाओं को समझाने और उनकी बात सुनने की जरूरत पर जोर दिया।

तीन सदस्यीय पीठ में कौन-कौन शामिल?

मामले की सुनवाई Supreme Court of India की तीन सदस्यीय पीठ कर रही थी। पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, न्यायमूर्ति सूर्यकांत वर्तमान में भारत के मुख्य न्यायाधीश हैं।

“सिर्फ राजनीतिक समझौते के आधार पर केस वापस न हों”

याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों को यह निर्देश देने की मांग की गई है कि हाल के छात्र प्रदर्शनों के दौरान हिंसा से जुड़े मामलों को केवल राजनीतिक समझौते के आधार पर वापस न लिया जाए। याचिकाकर्ता का कहना है कि प्रदर्शन का अधिकार अपनी जगह है, लेकिन हिंसा या कानून तोड़ने की घटनाओं में जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।

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मनीष कुमार सोलंकी की ओर से दायर याचिका में प्रदर्शन के आयोजकों की जवाबदेही तय करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील रिजवान अहमद ने कहा कि आंदोलन मंत्री और पुलिस की जवाबदेही से जुड़ा था, लेकिन प्रदर्शन के आयोजकों की भूमिका पर भी सवाल उठना जरूरी है।

आयोजकों की जिम्मेदारी पर उठे सवाल

वकील ने दलील दी कि अगर किसी प्रदर्शन के दौरान अप्रिय घटना होती है, तो केवल प्रदर्शनकारियों ही नहीं, बल्कि आयोजकों की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने आंदोलन का आह्वान किया, उन्हें भी यह देखना चाहिए कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे और हालात नियंत्रण से बाहर न जाएं।

उन्होंने यह भी कहा कि वह छात्रों को कठोर सजा देने की मांग नहीं कर रहे हैं। उनके अनुसार, अगर किसी नाबालिग ने प्रदर्शन के दौरान आपत्तिजनक नारे लगाए हैं, तो उससे सामुदायिक सेवा कराई जा सकती है। लेकिन पत्थरबाजी या हिंसा में शामिल लोगों को सिर्फ इसलिए नहीं छोड़ा जाना चाहिए कि सरकार की किसी गलती या मांग को स्वीकार कर लिया गया है।

“क्या हर आंदोलन के बाद सरकार झुकेगी?”

सुनवाई के दौरान वकील ने कहा कि अगर सरकार छात्रों की मांग मानने के बाद उनके खिलाफ दर्ज सभी मामले वापस लेने को तैयार हो जाती है, तो भविष्य में दूसरे समूह भी इसी तरह दबाव बनाने की कोशिश कर सकते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि आज छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं, तो कल दूसरी पीढ़ियां और अलग-अलग संगठन भी संसद तक पहुंचने का प्रयास कर सकते हैं। वकील ने सवाल उठाया कि अगर बड़ी संख्या में लोग संसद परिसर की ओर बढ़ते हैं, तो सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की स्थिति कैसे संभाली जाएगी।

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CJI बोले- युवाओं को समझाना जरूरी

इस पर CJI सूर्यकांत ने कहा कि युवा समाज का अहम हिस्सा हैं और उन्हें सही सलाह व मार्गदर्शन की जरूरत होती है। उन्होंने कहा कि ताकतवर राज्य की ओर से जरूरत से ज्यादा आक्रामक कार्रवाई हालात को और बिगाड़ सकती है। इसलिए ऐसे मामलों को बहुत सावधानी से संभालना जरूरी है।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि युवाओं को यह भरोसा मिलना चाहिए कि उनकी बात सुनी जा रही है। पुलिस को भी संयम से काम करना चाहिए, ताकि कोई छोटी घटना बड़े टकराव में न बदल जाए। उन्होंने कहा कि बेहतर रास्ता यही है कि युवाओं को समझाया जाए और शांतिपूर्ण तरीके से उनकी बात सुनी जाए, जिससे वे हिंसा का रास्ता न अपनाएं।

Location :  New Delhi

Published :  5 August 2026, 6:41 PM IST

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