माहवारी से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू, CJI सूर्यकांत समेत 9 जजों ने पूछे ये 7 बड़े सवाल

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला समीक्षा मामले की सुनवाई शुरू हो गई है, जहां 9 जजों की संविधान पीठ महिलाओं के मंदिर प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे अहम मुद्दों पर विचार कर रही है। अदालत ने 7 बड़े सवाल उठाए हैं और सभी पक्षों को समयसीमा का सख्ती से पालन करने का निर्देश दिया है।

Post Published By: Bobby Raj
Updated : 7 April 2026, 5:06 PM IST
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New Delhi: सुप्रीम कोर्ट में आज मंगलवार से केरल के सबरीमाला मंदिर से जुड़े बहुचर्चित मामले की समीक्षा सुनवाई शुरू हो गई है। अदालत ने इस मामले के लिए 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ का गठन किया है, जिसकी अध्यक्षता CJI सूर्यकांत कर रहे हैं। इस पीठ में न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना, एम.एम. सुंदरश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ए.जी. मसिह, प्रसन्न बी. वराले, आर. महादेवन और जोयमलया बागची शामिल हैं।

यह सुनवाई 2018 के उस ऐतिहासिक फैसले की समीक्षा से जुड़ी है, जिसमें सभी आयु वर्ग की महिलाओं को भगवान अयप्पा मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी। इस फैसले के खिलाफ दाखिल समीक्षा याचिकाओं पर अब दोबारा विचार किया जा रहा है। अदालत ने सात महत्वपूर्ण संवैधानिक सवालों की पहचान की है, जिनके जरिए अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और व्याख्या को स्पष्ट किया जाएगा।

माहवारी के आधार पर अछूत कहना गलत

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी महिला को माहवारी के कारण अछूत नहीं माना जा सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह दृष्टिकोण संवैधानिक रूप से सही नहीं है। यह टिप्पणी उस समय सामने आई, जब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 2018 के फैसले में अनुच्छेद 17 के उपयोग पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि महिलाओं के संदर्भ में अछूतता की अवधारणा को लागू करना सही नहीं है और इस पर पुनर्विचार होना चाहिए।

Supreme Court: सबरीमाला मामले की समीक्षा सुनवाई, 9 जजों की पीठ करेगी महिलाओं के प्रवेश पर विचार; पढ़ें पूरी खबर

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसले में न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ ने कहा था कि मासिक धर्म के आधार पर महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से रोकना अछूतता के दायरे में आता है और यह संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत प्रतिबंधित है। अब इस मुद्दे पर एक बार फिर गहन बहस हो रही है, जिससे यह मामला और व्यापक संवैधानिक विमर्श का विषय बन गया है।

अन्य धार्मिक मुद्दे भी दायरे में

सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वे सुनवाई के दौरान तय समयसीमा का सख्ती से पालन करें। अदालत ने कहा कि कई संवेदनशील मामले लंबित हैं, इसलिए किसी को अतिरिक्त समय नहीं दिया जाएगा। इससे यह संकेत मिलता है कि कोर्ट इस मामले में तेजी से निर्णय लेने के पक्ष में है।

सुनवाई के तय कार्यक्रम के अनुसार, समीक्षा याचिकाओं का समर्थन करने वाले पक्षों की दलीलें 7 से 9 अप्रैल तक सुनी जाएंगी, जबकि विरोध करने वाले पक्ष 14 से 16 अप्रैल तक अपने तर्क पेश करेंगे। जवाबी दलीलें 21 अप्रैल को और एमिकस क्यूरी द्वारा अंतिम दलीलें 22 अप्रैल तक पूरी होने की संभावना है।

इस मामले में केवल सबरीमाला मंदिर ही नहीं, बल्कि अन्य धार्मिक स्थलों से जुड़े मुद्दों पर भी विचार किया जाएगा। इनमें मस्जिदों और दरगाहों में मुस्लिम महिलाओं का प्रवेश, अंतरधार्मिक विवाह के बाद पारसी महिलाओं के अग्नि मंदिरों में प्रवेश का अधिकार, बहिष्करण की प्रथाओं की वैधता और दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला जननांग विकृति जैसे संवेदनशील मुद्दे शामिल हैं।

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सुनवाई से पहले त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड ने अदालत से आग्रह किया कि धार्मिक मामलों में समुदाय-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाया जाए और आस्था से जुड़ी परंपराओं की पुनर्व्याख्या से बचा जाए। वहीं केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सरकार समीक्षा याचिकाओं का समर्थन कर रही है।

कौन से हैं 7 बड़े सवाल?

  1. धर्म की स्वतंत्रता की सीमा और दायरा क्या है?
  2. अनुच्छेद 25 और 26 के अधिकारों के बीच संतुलन कैसे होगा?
  3. क्या धार्मिक अधिकार अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन हैं?
  4. ‘नैतिकता’ शब्द का वास्तविक अर्थ और दायरा क्या है?
  5. न्यायिक समीक्षा की सीमा और अधिकार क्षेत्र कितना है?
  6. अनुच्छेद 25(2)(बी) में ‘हिंदुओं के वर्ग’ का अर्थ क्या है?
  7. क्या कोई व्यक्ति धार्मिक प्रथाओं को जनहित याचिका से चुनौती दे सकता है?

Location :  New Delhi

Published :  7 April 2026, 5:06 PM IST

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